सतबरवा (पलामू): अनुज तिवारी,
पलामू जिले के सतबरवा प्रखंड अंतर्गत रबदा पंचायत के ग्राम फुलवरिया से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जो प्रशासनिक व्यवस्था और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां आदिम जनजाति समाज से आने वाला 27 वर्षीय युवक संदीप कुमार परहिया (पिता स्व. राजनाथ परहिया) आर्थिक तंगी और समय पर इलाज न मिलने के कारण अपने ही घर में ‘जिंदा लाश’ बनकर रहने को मजबूर है।
कमर से नीचे का हिस्सा हुआ बेजान
परिजनों के अनुसार, शुरुआत में संदीप को पैरों में हल्की झुनझुनी महसूस होती थी। लेकिन गरीबी के कारण परिवार उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जा सका। धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ती गई और जनवरी-फरवरी के दौरान अचानक उसकी कमर से नीचे का हिस्सा पूरी तरह निष्क्रिय हो गया।
आज हालत यह है कि वह चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ है और शौच जैसी दैनिक जरूरतों के लिए भी घिसटकर जाने को मजबूर है।
वृद्ध मां के सहारे चल रही जिंदगी
संदीप के पिता का वर्षों पहले निधन हो चुका है। घर में उसकी एकमात्र सहारा उसकी बुजुर्ग मां झरनी कुंवर हैं। इस उम्र में भी वह जंगल से सूखी लकड़ी चुनकर बाजार में बेचती हैं और उसी से किसी तरह घर का खर्च चलाती हैं।
अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण यह परिवार अब तक सरकारी योजनाओं और जनप्रतिनिधियों तक अपनी समस्या नहीं पहुंचा सका, जिससे यह मामला लंबे समय तक दबा रहा।
इलाज मिले तो बच सकती है जिंदगी
जमीनी पड़ताल में यह बात सामने आई है कि संदीप के पैरों में अभी भी हल्की संवेदना (दर्द) मौजूद है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उसे समय रहते रांची के RIMS या किसी बड़े सरकारी अस्पताल में उचित इलाज मिल जाए, तो उसके ठीक होने की संभावना बनी हुई है।
प्रशासन से लगाई गुहार
पीड़ित संदीप और उसकी मां ने पलामू उपायुक्त (DC), स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन से अपील की है कि उन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता, आर्थिक सहयोग और सरकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराया जाए, ताकि संदीप की जिंदगी बचाई जा सके।