भरत शर्मा की रिपोर्ट,
Palamu/पंडवा:-पंडवा प्रखंड अंतर्गत कजरी से सामाजिक कार्यकर्ता शुभम सिंह ने मनोभाव को व्यक्त करते हुए कहा की प्रकृति के पास वो सबकुछ है जिससे हमारी बुनियादी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। मगर हमारी असीमित लोभ-लिप्सा को संतृप्त करने की क्षमता प्रकृति को भी नहीं है। प्रकृति प्रेम के बिना उसके दोहन का नतीजा है कि हम आग के गोलों के बीच अपनी झुलसती जिंदगी घसीट रहे हैं। राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्से भीषण गर्मी के चपेट में है। पलामू भी इस अप्रिय उपलब्धि के लिए सुर्खियां बटोर रहा है। तापमान के नित्य नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।राजनीति तापमान के बीच मौसम के तापमान की चर्चा का भारी पड़ना मसले की गंभीरता को रेखांकित करता है। एक तरफ लोकसभा-2024 का चुनाव दूसरी ओर लू-लहर का प्रचंड बहाव। चुनाव के रिकार्ड दर्ज होने के पहले तापमान के नये-नये रिकार्ड देश भर में दर्ज हो रहे हैं। लोगों का जीना मुहाल हो गया है। रोज कमाने खाने वालों पर जैसे आफत आ गयी है। दातुन-पत्तल बेचकर जीवन बसर करने वाले वं रोजगार के तलाश में भटकते लोगों को तो खुद को रोज ताप भट्टी में झोंकना मजबूरी है हीं,चांदी के चम्मच वाले भी ‘गर्मी-गर्मी’ कहकर छटपटा रहे हैं।आखिर हम विभीषिका के इस मोड़ पर कैसे आ गये? क्या यह सही नहीं है कि हमने जो बोया है वहीं काट रहे हैं? अब तो हम बसंत ऋतु न देख पाते हैं और महसूस कर पाते हैं। केवल किताबों में पढ़ लेते हैं और आभासी जीवन जी लेते हैं।नदियां सूखी गयी हैं। तालाबों में दरारें फटी हैं।हवाएं आग उगल रही हैं। पानी के लिए त्राहिमाम मची है। हमारी स्थिति ऐसी है कि न हम भगवान को दोष दे सकते हैं और न ही प्रकृति को। उन्होंने तो सबकुछ दिया है। हम रख नहीं पा रहे हैं। हमारा रहन-सहन ही बिगड़ैल है। रहन नहीं सुधरा तो सहन करना ही पड़ेगा। फल खाने में मजा आता है। लेकिन पेड़ लगाने में तौहिनी महसूस करते हैं। पानी स्वच्छ चाहिए,पर कचरा उसी में फेंकगे। मौसम सुहाना रहे,मगर वनों उजाड़ना बंद नहीं करेंगे। अभी वक्त है,चेत जाने का। अभी समय है,जग जाने का।तय मानिए कि ढपोरशंखी नुमाइंदों के नारों से प्रकृति में संतुलन नहीं आने वाला है। मदोन्मत्त हाकिमों की संचिकाएं इसमें कोई राहत नहीं पहुंचा सकतीं। सिर्फ प्रकृति के प्रति हमारी अच्छी नियत ही पृथ्वी को खूबसूरत व रहने लायक बना सकती है। इस संकट से मुंह छिपाने में नहीं संकट को मिटाने में अपने हिस्से का योगदान देने में भलाई है।
कभी पलामू खूब ‘पाला’ पड़ने के लिए जाना जाता था। ‘पलामू’ नामकरण का एक कारण यह भी बताया जाता है। आज पलामू ‘आग’ बरसने के लिए अखबारों के प्रथम पृष्ठ और न्यूज़ चैनल का हेडलाइन बन रहा है। ऐसी उपलब्धि हमें कतई गर्व की अनुभूति नहीं कराती। इसलिए आइए,अबकी बरसात में कम से कम एक पेड़ लगाने का न्यूनतम फर्ज निभायें।