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राजस्थान की पंचायत में महिलाओं के लिए स्मार्टफोन पर प्रतिबंध,फैसले ने छेड़ी अधिकारों और समानता की बहस

एजेंसी |जयपुर।राजस्थान के एक ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत द्वारा महिलाओं के लिए स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का मामला सामने आया है, जिसने राज्यभर में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक बहस को जन्म दे दिया है। पंचायत के इस फैसले को जहां परंपरा और सामाजिक अनुशासन से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर…

राजस्थान की पंचायत में महिलाओं के लिए स्मार्टफोन पर प्रतिबंध,फैसले ने छेड़ी अधिकारों और समानता की बहस
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राजस्थान की पंचायत में महिलाओं के लिए स्मार्टफोन पर प्रतिबंध,फैसले ने छेड़ी अधिकारों और समानता की बहस

एजेंसी |जयपुर।
राजस्थान के एक ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत द्वारा महिलाओं के लिए स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का मामला सामने आया है, जिसने राज्यभर में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक बहस को जन्म दे दिया है। पंचायत के इस फैसले को जहां परंपरा और सामाजिक अनुशासन से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे महिलाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा और डिजिटल अधिकारों पर सीधा हमला बताया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, संबंधित पंचायत ने यह निर्णय लिया कि गांव की महिलाएं और किशोरियां सार्वजनिक स्थानों पर स्मार्टफोन का उपयोग नहीं करेंगी। पंचायत का तर्क है कि स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से “सामाजिक मर्यादाओं” का उल्लंघन हो रहा है और पारिवारिक व सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कदम गांव में बढ़ते “अनुशासनहीन व्यवहार” और “गलत प्रवृत्तियों” को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है।

पंचायत के इस आदेश के बाद गांव में महिलाओं के बीच भय और असमंजस की स्थिति बन गई है। कई महिलाओं का कहना है कि स्मार्टफोन उनके लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, सरकारी योजनाओं की जानकारी, स्वास्थ्य सेवाओं, ऑनलाइन भुगतान और आपातकालीन संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। विशेष रूप से वे महिलाएं, जिनके पति बाहर काम करते हैं, स्मार्टफोन के माध्यम से बैंकिंग, राशन, पेंशन और बच्चों की पढ़ाई से जुड़े कार्य करती हैं।

महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पंचायत के इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह निर्णय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है। संगठनों का तर्क है कि अगर किसी तकनीक का दुरुपयोग हो रहा है, तो समाधान जागरूकता और शिक्षा है, न कि किसी एक वर्ग पर प्रतिबंध लगाना।

राजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा गर्मा गया है। विपक्षी दलों ने राज्य सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि पंचायतों को ऐसे फरमान जारी करने का अधिकार नहीं है, जो किसी विशेष वर्ग को लक्षित कर उनके मौलिक अधिकारों को सीमित करें। कुछ नेताओं ने इसे “मध्ययुगीन सोच” करार देते हुए कहा कि डिजिटल इंडिया के दौर में इस तरह के फैसले समाज को पीछे ले जाने वाले हैं।

वहीं पंचायत समर्थकों का कहना है कि गांव की सामाजिक संरचना और परंपराओं को बनाए रखना भी आवश्यक है। उनका दावा है कि यह निर्णय महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। हालांकि वे यह स्वीकार करते हैं कि इस विषय पर आगे ग्रामीणों के साथ संवाद किया जाएगा।

प्रशासनिक स्तर पर भी मामले को संज्ञान में लिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि पंचायत के किसी भी निर्णय को कानून और संविधान के दायरे में होना चाहिए। यदि यह आदेश नियमों के विरुद्ध पाया गया, तो उचित कार्रवाई की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में बदलते सामाजिक मूल्यों, तकनीक की भूमिका और महिला सशक्तिकरण की दिशा में चल रही संघर्ष की एक झलक है। स्मार्टफोन आज महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और जानकारी का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका है। ऐसे में इस पर रोक लगाना महिलाओं को फिर से हाशिए पर धकेलने जैसा है।

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