निशांत कुमार सानू की रिपोर्ट,
पाकुड़। इतिहास जब अपनी सबसे जीवंत तस्वीर दिखाता है, तो वह किसी किताब के पन्नों में नहीं, बल्कि समाज की परंपराओं में नजर आता है। झारखंड के पाकुड़ की ऐतिहासिक रथयात्रा ऐसी ही अमर विरासत है, जो पिछले 329 वर्षों से समय के हर उतार-चढ़ाव को पार करते हुए आज भी उसी श्रद्धा, राजशाही गरिमा और जनआस्था के साथ आगे बढ़ रही है।
भगवान मदनमोहन की यह रथयात्रा वर्ष 1697 में शुरू हुई थी। गुरुवार की शाम जब भगवान मदनमोहन राधिका संग भव्य रथ पर विराजमान होकर राजबाड़ी से मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं होती, बल्कि मुगलकाल से लेकर आधुनिक भारत तक का जीवंत इतिहास सड़कों पर उतर आता है।
यह रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि तीन शताब्दियों से अधिक समय से संतालपरगना की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक गौरव की प्रतीक रही है। राजवंश बदले, शासन बदले, सीमाएं बदलीं, रथ का स्वरूप और यात्रा मार्ग भी बदला, लेकिन भगवान मदनमोहन की रथयात्रा कभी नहीं रुकी।
प्रारंभ में यह यात्रा कंचनगढ़ से शुरू हुई, जहां पाकुड़ राज के प्रथम राजा पितृ चंद्र शाही ने इसकी नींव रखी। बाद में पहाड़िया विद्रोह और बदलती परिस्थितियों के कारण राजधानी मोहनपुर स्थानांतरित हुई, लेकिन रथयात्रा की परंपरा निरंतर जारी रही।
वर्ष 1856 में राजपरिवार के पाकुड़ आगमन के बाद राजापाड़ा स्थित राजबाड़ी से रथयात्रा निकालने और विशाल मेले के आयोजन की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी कायम है। वर्ष 1931 में रानी ज्योतिर्मयी देवी ने लकड़ी के पुराने रथ की जगह लगभग 20 फीट ऊंचा भव्य पीतल का रथ बनवाया, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
वर्तमान में प्रशासनिक कारणों से रथयात्रा के मार्ग में बदलाव किया गया है, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक रथयात्रा में शामिल होकर भगवान मदनमोहन के दर्शन करते हैं और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
पाकुड़ की यह रथयात्रा आज भी इतिहास, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम बनी हुई है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत विरासत है।