रांची। झारखंड में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर राहत भरी खबर आई है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा 7 मई को जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जहां वर्ष 2020 में यह अनुपात 56 था, वहीं अब यह घटकर 51 पर आ गया है। यानी राज्य में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु की संख्या में पाँच अंकों की गिरावट दर्ज की गई है।
यह सुधार राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर है। देशभर में मातृ मृत्यु अनुपात 97 से घटकर 93 पर आया है, यानी महज चार अंकों की कमी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि झारखंड में मातृ मृत्यु दर (जो कि 15-49 आयु वर्ग की महिलाओं में प्रसव से जुड़ी मौतों को दर्शाती है) भी घटी है। यह दर पहले 4.2 थी, जो अब 4 हो गई है। इसके साथ ही, महिलाओं के लाइफ टाइम रिस्क (प्रजनन आयु में प्रसव से संबंधित कारणों से मृत्यु की संभावना) में भी सुधार हुआ है। यह दर 0.15 प्रतिशत से घटकर 0.13 प्रतिशत हो गई है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 0.21 प्रतिशत से 0.20 प्रतिशत हुई है।
हालांकि, राज्य में शिशु मृत्यु दर (IMR) के मोर्चे पर कोई प्रगति नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, तीन वर्षों बाद भी यह दर 25 पर बनी हुई है। इसका अर्थ है कि झारखंड में प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर 25 शिशुओं की मृत्यु एक वर्ष के भीतर हो जाती है। इस दर में लिंगानुसार भेद भी कायम है। लड़कों में यह दर 24 और लड़कियों में 26 है, जो तीन वर्ष पहले भी यही थी।
शहरी और ग्रामीण इलाकों में स्थिति भी मिश्रित है। शहरी क्षेत्रों में शिशु लड़कों की मृत्यु दर बढ़कर 19 से 21 हो गई है, जबकि शहरी लड़कियों में यह दर घटकर 23 से 21 हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया है। यहां शिशु मृत्यु दर 26 बनी हुई है, जिसमें लड़कों की दर 25 और लड़कियों की दर 27 है।
देश की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर में सुधार हुआ है। यह दर 28 से घटकर 27 पर आ गई है। झारखंड में इस मामले में ठहराव चिंता का विषय है, खासकर तब जब अन्य राज्य इस मोर्चे पर आगे बढ़ रहे हैं।
मातृ मृत्यु अनुपात और मातृ मृत्यु दर में अंतर समझना जरूरी है। मातृ मृत्यु अनुपात प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु को दर्शाता है, जबकि मातृ मृत्यु दर, किसी क्षेत्र की कुल प्रजनन आयु (15-49 वर्ष) की महिलाओं में मातृ मृत्यु की संख्या को दर्शाता है और यह प्रति हजार महिलाओं पर आंकी जाती है।
एसआरएस की यह रिपोर्ट तीन वर्षों के अंतराल के बाद जारी की गई है। पिछली रिपोर्ट मई 2022 में प्रकाशित हुई थी, जिसमें वर्ष 2020 को आधार वर्ष माना गया था। इस बार 2021 को आधार वर्ष बनाकर सर्वेक्षण किया गया है। यह रिपोर्ट राज्य की स्वास्थ्य नीतियों के लिए दिशा निर्धारण में अहम भूमिका निभा सकती है।