लेखक: बृंदा प्रसाद गुप्ता (सेवानिवृत्त शिक्षक)
22 अप्रैल 2026 को पूरे विश्व में “विश्व पृथ्वी दिवस” मनाया जा रहा है। यह दिन हमें हमारी धरती के महत्व, उसके संरक्षण और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन संभव है। यहाँ हमें शुद्ध वायु, जल, भोजन और रहने योग्य वातावरण प्राप्त होता है। इसलिए इसका संरक्षण करना केवल हमारा कर्तव्य ही नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त भी है।
विश्व पृथ्वी दिवस की शुरुआत 1970 में अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने की थी। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह एक वैश्विक आंदोलन बन जाएगा। आज यह दिन दुनिया के अधिकांश देशों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
आज विश्व जिस सबसे बड़ी समस्या से जूझ रहा है, वह है पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग। बढ़ते तापमान, जल संकट, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास और प्रदूषण ने मानव जीवन को संकट में डाल दिया है। हमारे बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि पहले इतनी गर्मी नहीं होती थी, जल संकट इतना गहरा नहीं था। यह परिवर्तन हमारे असंतुलित विकास और प्रकृति के प्रति लापरवाही का परिणाम है।
भारत के संविधान में भी पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है। अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश दिया गया है, वहीं अनुच्छेद 51A (g) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, वन, झील, नदी और वन्य जीवों का संरक्षण करे। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कई महान व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पर्यावरण प्रेमी वकील एम. सी. मेहता द्वारा दायर जनहित याचिकाओं ने भारत में पर्यावरण कानून को नई दिशा दी। उनके प्रयासों से कई ऐतिहासिक फैसले हुए, जिन्होंने प्रदूषण नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्ष 1987 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित “ब्रंटलैंड रिपोर्ट” में “सतत विकास” की अवधारणा को स्पष्ट किया गया। इसके अनुसार, “ऐसा विकास जो वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे।” आज के समय में यही विचार सबसे अधिक प्रासंगिक है।
विश्व पृथ्वी दिवस हमें केवल समस्याओं की ओर ध्यान दिलाने के लिए नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। हमें यह समझना होगा कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। जैसे—
- अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना
- जल संरक्षण के उपाय अपनाना
- प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग करना
- स्वच्छता अभियान में भाग लेना
- नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर और पवन ऊर्जा का प्रयोग बढ़ाना
- जैविक खेती और बागवानी को बढ़ावा देना
विद्यालयों की भूमिका भी इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करें। प्रातःकालीन सभाओं में पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा होनी चाहिए। बच्चों को व्यावहारिक रूप से पौधारोपण, सफाई अभियान और जल संरक्षण जैसे कार्यों में शामिल किया जाना चाहिए।
मैं स्वयं अपने शिक्षण काल में बच्चों और शिक्षकों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का प्रयास करता रहा हूँ। यह देखकर संतोष होता है कि आज के बच्चे इस विषय को गंभीरता से ले रहे हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज का हर वर्ग—चाहे वह छात्र हो, शिक्षक, अभिभावक, किसान, व्यापारी या सरकारी अधिकारी—सभी मिलकर इस दिशा में कार्य करें। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।
विश्व पृथ्वी दिवस के इस अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी धरती की रक्षा करेंगे। हम अधिक से अधिक वृक्ष लगाएंगे, जल और ऊर्जा की बचत करेंगे, प्लास्टिक का उपयोग कम करेंगे और स्वच्छ पर्यावरण बनाए रखने में योगदान देंगे।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि “हमारी पृथ्वी ही हमारी शक्ति है।” यदि पृथ्वी सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसलिए आइए, इस पृथ्वी दिवस पर हम सभी मिलकर अपनी धरती को बचाने का संकल्प लें और एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित भविष्य की ओर कदम बढ़ाएँ।
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