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सरस्वती पूजा की तैयारी जोरों पर: पड़वा में दो महीने पहले से बन रही हैं माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ

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सरस्वती पूजा की तैयारी जोरों पर: पड़वा में दो महीने पहले से बन रही हैं माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ

संवाददाता विक्रम यादव

पंडवा/पलामू:- सरस्वती पूजा नज़दीक आते ही पलामू जिले के पड़वा प्रखंड में मूर्तिकारों की चहल–पहल तेज़ हो गई है। हर गली–मुहल्ले में माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ गढ़ी जा रही हैं। कलाकार दिन–रात एक कर मिट्टी को आकार देने, सांचे तैयार करने, रंग–रोगन और सजावट में जुटे हुए हैं। कार्यशालाओं में लगातार हथौड़ी, छेनी और ब्रश की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं, जो कलाकारों की मेहनत और लगन को बयां करती हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सरस्वती पूजा के समय पड़वा प्रखंड की अलग पहचान बन जाती है। यहाँ बनाए जाने वाली प्रतिमाएँ अपने विशेष डिज़ाइन और कलात्मक स्वरूप के लिए जानी जाती हैं। इसी वजह से हर साल दूर–दराज़ के इलाकों से लोग यहाँ आकर माँ सरस्वती की प्रतिमा बनवाते हैं। कलाकार माँ को पारंपरिक रूप के साथ–साथ आधुनिक और आकर्षक अंदाज़ में भी स्वरूप देने की कोशिश करते हैं, ताकि पूजा पंडालों की शोभा और भी बढ़ सके।

सरस्वती पूजा की तैयारी जोरों पर: पड़वा में दो महीने पहले से बन रही हैं माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ

मूर्तिकारों का कहना है कि प्रतिमा निर्माण कोई एक–दो दिन का काम नहीं होता। इसके लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू करनी पड़ती है। पहले उपयुक्त मिट्टी जुटाई जाती है, फिर ढांचा तैयार कर धीरे–धीरे उसे आकार दिया जाता है। इसके बाद प्रतिमा को सुखाया जाता है और फिर रंग–रोगन व सजावट का काम शुरू होता है। हर चरण में बारीकी और धैर्य की आवश्यकता होती है।मूर्तिकार श्री राम प्रजापति ने बताया कि वे लोग सरस्वती पूजा से लगभग दो महीने पहले ही माँ की प्रतिमाएँ बनाने में लग जाते हैं।

इस वर्ष उनके समूह द्वारा करीब 110 प्रतिमाएँ तैयार की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ती मांग के कारण काम का दायरा हर साल बढ़ता जा रहा है, लेकिन आर्थिक चुनौतियों और समय की कमी के बावजूद कलाकार पूरी निष्ठा से अपने कार्य में जुटे रहते हैं।कलाकारों को उम्मीद है कि इस बार भी माँ सरस्वती की पूजा भव्य रूप से संपन्न होगी और उनकी बनाई गई प्रतिमाएँ श्रद्धालुओं के बीच श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनेंगी।

वहीं स्थानीय लोगों का मानना है कि इस तरह के पारंपरिक कला कार्य न सिर्फ धार्मिक आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि स्थानीय कलाकारों को रोज़गार और पहचान भी दिलाते हैं।

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