संवाददाता: अनुज तिवारी
ताबर: इस्लाम धर्म में रमजान का महीना विशेष महत्व रखता है। इसे इबादत, संयम और आत्मसंयम का महीना माना जाता है। इस पवित्र महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग रोज़ा रखते हैं, ताकि वे भूख और प्यास सहन कर गरीबों के दुख-दर्द को महसूस कर सकें। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ताबर निवासी मोहम्मद आलमगीर अंसारी के 6 वर्षीय बेटे अब्दुल समाद उर्फ़ अहिल ने पहली बार रोज़ा रखा। इतनी कम उम्र में आहिल द्वारा किए गए इस नेक कार्य पर परिवार और आसपास के लोग बेहद खुश हैं।
परिवार में उत्साह और गर्व का माहौल
अब्दुल समाद के रोज़ा रखने पर उनके पिता मोहम्मद आलमगीर अंसारी ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा, “मुझे बहुत गर्व हो रहा है कि मेरे बेटे ने इतनी छोटी उम्र में रमजान के महत्व को समझा और रोज़ा रखा। अल्लाह उसे और तरक्की दे, यही दुआ करता हूं।” उन्होंने आगे बताया कि आहिल बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति का रहा है और इस्लाम के नियमों का पालन करने में रुचि रखता है।
रमजान का महत्व और रोज़े की परंपरा
इस्लाम धर्म के अनुसार, रमजान आत्मशुद्धि और अल्लाह की इबादत का महीना है। इस दौरान सूर्योदय से सूर्यास्त तक बिना कुछ खाए-पिए रोज़ा रखा जाता है। यह सिर्फ भूख-प्यास सहने की परीक्षा नहीं, बल्कि संयम और सहिष्णुता की भी मिसाल है। रोज़ेदार को न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी संयम रखना होता है।
समुदाय में चर्चा का विषय बना आहिल का रोज़ा
छोटी उम्र में रोज़ा रखने की वजह से आहिल पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है। पड़ोसी और रिश्तेदार भी आहिल के इस कदम की सराहना कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि इतनी कम उम्र में रोज़ा रखना इस बात का संकेत है कि नई पीढ़ी धार्मिक मूल्यों और परंपराओं को समझ रही है।
अल्लाह से दुआ और आशीर्वाद
परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों ने आहिल को दुआएं दीं और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। रमजान के इस पवित्र महीने में, आहिल का रोज़ा रखना न केवल परिवार के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।
रमजान का समापन और ईद की तैयारियां
जैसे-जैसे रमजान के दिन आगे बढ़ रहे हैं, परिवार और समुदाय के लोग ईद की तैयारियों में भी जुट गए हैं। रमजान के अंत में ईद-उल-फितर मनाई जाती है, जो भाईचारे और खुशी का प्रतीक है।
आहिल के इस सराहनीय कदम ने न सिर्फ उसके माता-पिता को गौरवान्वित किया है, बल्कि यह भी दिखाया कि धार्मिक परंपराएं और संस्कार नई पीढ़ी में भी जीवंत हैं।