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मुगल शासन काल से होती आ रही है मां काली की अनवरत पूजा

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मुगल शासन काल से होती आ रही है मां काली की अनवरत पूजा

राजमहल। शहर के लगभग 3 किलोमीटर दूर गुनीहारी पंचायत अंतर्गत राजमहल-तीनपहाड़ रोड पर बेगमपुरा गांव स्थित झमझमिया काली मंदिर मुगलकाल से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। बुजुर्गों एवं ग्रामीण से मिलीं जानकारी के अनुसार मुगल के शासन काल में मां काली उस रास्ते से पांव में पायल पहने छम-छम कर गुजर…

मुगल शासन काल से होती आ रही है मां काली की अनवरत पूजा
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मुगल शासन काल से होती आ रही है मां काली की अनवरत पूजा

राजमहल। शहर के लगभग 3 किलोमीटर दूर गुनीहारी पंचायत अंतर्गत राजमहल-तीनपहाड़ रोड पर बेगमपुरा गांव स्थित झमझमिया काली मंदिर मुगलकाल से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। बुजुर्गों एवं ग्रामीण से मिलीं जानकारी के अनुसार मुगल के शासन काल में मां काली उस रास्ते से पांव में पायल पहने छम-छम कर गुजर रही थीं।

इस दौरान गांव के एक व्यक्ति उन्हें टोक दिया। आवाज सुनते ही देवी शीलारूप में हो गईं। उसी व्यक्ति ने उस स्थान को बांस की टाटी से घेरकर काली मंदिर बनाकर पूजा अर्चना शुरू किया। उस समय यहां मुगल शासन था। मुगल शासकों ने वहां की सभी संपत्ति सोना, चांदी, जेवरात को लूट लिया था। मंदिर ध्वस्त कर दिया था। बाद में गांव के लोगों ने टूटे मंदिर की खंडित शीला की एक झोपड़ी बनाकर फिर पूजा शुरू की। तबसे यहां मां काली की पूजा होती रही है।

1982 में राजमहल के तत्कालीन सप्लाई इंस्पेक्टर हरिशंकर सिंह ने झोपड़ी हटाकर वहां दीवार व चदरा से मंदिर बनाया। सेवानिवृत्ति के बाद 2015 आमलोगों के सहयोग से चंदा इकट्ठा कर भव्य मंदिर बनवाया। लेकिन पुनः एक बार फिर मंदिर वहां से गुजर रहे निर्माणाधीन का फोर लेन सड़क पर मां का मंदिर नक्शा के अनुसार पड़ गया। प्रक्रिया पूरी करने के बाद ठीक उसे मंदिर के सामने सड़क के उसे पर टिने का डालकर पूरी विधि विधान से मां की शीला को स्थापित किया गया। कमेटी के द्वारा ठीक उसी के सटे एक भव्य और आकर्षण का मंदिर निर्माण कराया जा रहा है मंदिर का कार्य लगभग अंतिम चरण पर है।उसके बाद वहां मां काली की शीला को फिर से विराजमान किया जाएगा।

अभी फिलहाल लगभग दो वर्षों से टीना का सेड वाले मंदिर पर ही पूजा अर्चना हो रही है।मंदिर में प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड के अन्य हिस्सों से लोग पूजा करते पहुंचते हैं। काली मंदिर में देवी की शक्ति का वास है। यहां से कोई निराश नहीं लौटता। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पशु (पाठा) बलि देते हैं। मंदिर में अमावस्या को निशी पूजा होती है।

मंदिर में मूर्ति की पूजा नहीं बल्कि शीला पूजा होता है। यह मंदिर शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। इस बार कमेटी के द्वारा पूरे हर्षोल्लास व धूमधाम से मनाने की तैयारी की जा रही है।

1-कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि पूजा का आयोजन को लेकर पूजा समिति व ग्रामीण लोग लगे हुए हैं सजावट, पंडाल, लाइटिंग की व्यवस्था की जा रही है।
सुखवा उरांव, अध्यक्ष
2-सचिव ने बताया कि पूजा की तैयारी जोर-जोर से की जा रही है । कमेटी के सभी सदस्य अपना-अपना सहयोग दे रहे हैं।22 नवंबर को सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं झंडी मेला की तैयारी भी की जा रही है ।
विष्णु चौधरी, सचिव

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