बृन्दा प्रसाद गुप्ता (सेवानिवृत्त शिक्षक)
हर वर्ष 3 मई को दुनिया भर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा यूनेस्को की सिफारिश पर की गई थी। इस दिन का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करना और पत्रकारों की सुरक्षा तथा अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
प्रेस को लोकतंत्र का “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ मिलकर लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। एक स्वतंत्र प्रेस ही सरकार की नीतियों में पारदर्शिता लाता है और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
हालांकि, वर्तमान समय में प्रेस की स्वतंत्रता कई चुनौतियों का सामना कर रही है। दुनिया के कई देशों में पत्रकारों को धमकियों, हिंसा और सेंसरशिप का सामना करना पड़ता है। भारत में भी आपातकाल 1975 के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे, जो एक ऐतिहासिक उदाहरण है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2025 के अनुसार,
- भारत की रैंकिंग 157वां स्थान रही है
- कुल 180 देशों की सूची में यह स्थान दर्ज किया गया है
यह स्थिति दर्शाती है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को और मजबूत करने की आवश्यकता है, हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में कुछ सुधार देखने को मिला है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है। हालांकि, यह स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है—देश की संप्रभुता, सुरक्षा, कानून व्यवस्था और नैतिकता के हित में कुछ आवश्यक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस ही स्वस्थ लोकतंत्र की नींव होता है। यह दिन न केवल पत्रकारों के साहस और समर्पण को सम्मान देने का अवसर है, बल्कि समाज को यह भी प्रेरित करता है कि वह सच और पारदर्शिता के पक्ष में खड़ा रहे।