रांची। झारखंड के 18 वन जिलों में हाथियों का लगातार विचरण हो रहा है। पिछले छह महीनों में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं, जिनमें 25 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। हालात को देखते हुए वन विभाग ने इन सभी वन प्रमंडलों में एलिफेंट रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने का निर्णय लिया है।
सप्ताह भर पहले झुंड से बिछड़ा एक हाथी Ranchi में विधानसभा से महज तीन किलोमीटर की दूरी तक पहुंच गया था। इस घटना के बाद विभाग ने निगरानी व्यवस्था को और सशक्त करने का फैसला लिया है।
चार से अधिक रेस्क्यू सेंटर करेंगे निगरानी
राज्य में चार से अधिक रेस्क्यू सेंटर हाथियों के मूवमेंट पर लगातार नजर रखेंगे। प्रधान मुख्य वन संरक्षक के अनुसार राज्य में 680 से अधिक हाथी मौजूद हैं। इनके संरक्षण के साथ-साथ पारंपरिक कॉरिडोर को निर्बाध बनाने की दिशा में भी पहल की जा रही है।
सभी रेस्क्यू सेंटर में क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) की तैनाती होगी। टीम के पास हाथियों को ट्रैंक्युलाइज करने के उपकरण भी उपलब्ध रहेंगे, ताकि आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
भोजन और पानी की कमी बन रही बड़ी वजह
वन्य प्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में भोजन की कमी हाथियों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने का मुख्य कारण है। बांस जैसे प्रमुख भोजन स्रोत जंगल कटाई की वजह से कम हो रहे हैं। इसके विपरीत, गांवों में धान और गन्ना जैसी फसलें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे हाथी बस्तियों की ओर रुख करते हैं।
हाल ही में रांची पहुंचा हाथी देर रात तक Dhurwa Dam क्षेत्र में रुका रहा और बाद में बिना नुकसान पहुंचाए जंगल लौट गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जंगलों में पर्याप्त पानी और भोजन उपलब्ध हो, तो हाथियों के उग्र होने और आबादी की ओर बढ़ने की संभावना कम हो जाती है।
एलिफेंट कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त करना जरूरी
राज्य में हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर को काफी हद तक अतिक्रमण मुक्त किया गया है, लेकिन खनन और ट्रांसपोर्टिंग गतिविधियों के कारण तेज रोशनी और शोर से हाथी प्रभावित होते हैं। खासकर Hazaribagh क्षेत्र में हाथियों की बढ़ती सक्रियता को इसी से जोड़ा जा रहा है।
वन एवं पर्यावरण विभाग कॉरिडोर क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने की दिशा में काम कर रहा है। मुख्यमंत्री Hemant Soren ने भी खनन योजनाओं के साथ वन्यजीव संरक्षण उपायों को अनिवार्य करने के निर्देश दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कॉरिडोर सुरक्षित और जंगल संसाधन समृद्ध किए जाएं, तो मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।