गरीबी की ऐसी मार, गांव तक नहीं पहुंच सका बेटे का शव; पुणे में ही करना पड़ा अंतिम संस्कार
एक साल पहले पिता की मौत, अब जवान बेटे को भी खोया; आर्थिक तंगी ने छीन लिया अपनों के बीच अंतिम विदाई का मौका


मंगलहाट :-गरीबी का दर्द तब और गहरा हो गया, जब एक परिवार अपने जवान बेटे का शव अंतिम संस्कार के लिए पैतृक गांव तक नहीं ला सका। आर्थिक तंगी ऐसी कि 20 वर्षीय बेटे को आखिरी बार गांव की मिट्टी नसीब नहीं हुई। राजमहल थाना क्षेत्र के चंडीपुर गांव निवासी स्वर्गीय पुनेश मंडल के पुत्र सुजीत मंडल का अंतिम संस्कार महाराष्ट्र के पुणे में ही करना पड़ा। बेटे की संदिग्ध मौत के सदमे से जूझ रहे परिवार के लिए यह मजबूरी किसी गहरे जख्म से कम नहीं थी। घटना के बाद चंडीपुर गांव में शोक का माहौल है।
कमरे में मिला था सुजीत का शव,मौत पर सवाल
जानकारी के अनुसार, रविवार सुबह महाराष्ट्र पुलिस ने सुजीत का शव उसके कमरे में फंदे से लटका हुआ बरामद किया था। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी की और पोस्टमार्टम के बाद उसे सुरक्षित रखवाया। सोमवार सुबह करीब 10 बजे चंडीपुर गांव से पुणे पहुंचे मृतक के बड़े पापा गेनशु मंडल और अन्य परिजनों को पुलिस ने शव सौंप दिया। लेकिन आर्थिक तंगी के कारण परिवार शव को गांव नहीं ला सका। अंततः पुणे के श्मशान घाट में हिंदू रीति-रिवाज से उसका अंतिम संस्कार किया गया।
आत्महत्या या हत्या? हर पहलू की जांच
सुजीत की मौत आत्महत्या है या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। महाराष्ट्र पुलिस मामले की जांच में जुटी है। पुलिस कमरे के बाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल रही है। मृतक के मोबाइल फोन समेत अन्य संभावित साक्ष्यों की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस जांच के बाद ही मौत की असली वजह सामने आ सकेगी।
एक साल पहले पिता को खोया,अब उजड़ गया मां का सहारा
सुजीत के परिवार पर दुखों का पहाड़ पहले भी टूट चुका था। करीब एक साल पहले उसके पिता पुनेश मंडल की केरल में मौत हो गई थी। पिता की मौत के गम से परिवार उबर भी नहीं पाया था कि अब जवान बेटे की संदिग्ध मौत ने उसे एक और गहरा सदमा दे दिया। परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है, जिससे उबर पाना आसान नहीं होगा।
बेटे के गम में बेसुध हो रही मां
चंडीपुर गांव में सुजीत की मौत की खबर पहुंचते ही मातम पसर गया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। मां पुतुल देवी बेटे को खोने के सदमे में बार-बार मूर्छित हो जा रही थीं। जिस बेटे को अंतिम विदाई देने के लिए परिवार उसे अपनी मिट्टी तक लाना चाहता था, उसे आर्थिक मजबूरी के कारण हजारों किलोमीटर दूर ही विदा करना पड़ा। यह घटना परिवार के असहनीय दुख के साथ उस बेबसी को भी उजागर करती है, जहां गरीबी के कारण अपनों को अंतिम विदाई देने की इच्छा भी अधूरी रह जाती है।
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