एक आत्मीय संबंध की अविस्मरणीय कहानी
पत्रकार दीपक सवाल की कलम से
कुछ लोग केवल सार्वजनिक जीवन के बड़े नाम नहीं होते, वे अपने व्यवहार, अपनापन और रिश्तों की ऊष्मा से लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। स्वर्गीय माधवलाल सिंह, जिन्हें पूरा इलाका स्नेह और सम्मान से ‘माधव बाबू’ कहता था, ऐसे ही व्यक्तित्व थे। राजनीति उनकी पहचान रही, लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी थी लोगों से उनका आत्मीय रिश्ता। मेरे परिवार के साथ भी उनका ऐसा ही एक पुराना और भावनात्मक संबंध रहा, जिसकी शुरुआत केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास से जुड़ी एक अनोखी घटना से हुई थी।
यह रिश्ता मेरे पिता, भूतपूर्व सरपंच स्वर्गीय सुरेश कुमार जायसवाल के समय से जुड़ा हुआ था। आज जब माधव बाबू हमारे बीच नहीं हैं, तब स्मृतियों के पन्ने पलटते हुए कई दृश्य एक साथ आंखों के सामने उभर आते हैं। उनमें सबसे जीवंत स्मृति है उस रथ के लकड़ी के घोड़े की, जिसने जैसे दो परिवारों के बीच एक आत्मिक सेतु का काम किया था।
खैराचातर की रथ यात्रा और वह लकड़ी का घोड़ा
यह 1970-80 के दशक की बात है। आज की पीढ़ी शायद नहीं जानती कि खैराचातर में भी कभी रथ यात्रा का आयोजन हुआ करता था। यह आयोजन लगातार तीन वर्षों तक चला। गांव के एक श्रद्धालु ने अपनी मन्नत पूरी होने पर इसकी शुरुआत की थी। उन दिनों रथ यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का बड़ा उत्सव होती थी।
जब तीन वर्षों बाद रथ यात्रा का आयोजन स्थगित करने का निर्णय लिया गया, तब रथ के विभिन्न हिस्सों और विशेष रूप से उसके घोड़ों को गांव के कुछ सम्मानित परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए सौंपा गया। ये वस्तुएं केवल लकड़ी के टुकड़े नहीं थीं; उनमें श्रद्धा, स्मृति और परंपरा की आत्मा बसती थी।
ऐसे ही एक लकड़ी का रथ-घोड़ा मेरे पिता को मिला था। उस समय हम लोग अपने पुराने घर में रहा करते थे। वह घोड़ा घर के कोठा में बड़े जतन और सम्मान के साथ रखा गया था। बचपन में हम उसे केवल एक वस्तु के रूप में नहीं देखते थे। घर के बड़े-बुजुर्गों के लिए वह किसी पवित्र धरोहर से कम नहीं था।
किसे पता था कि वर्षों बाद यही घोड़ा एक राजनीतिक यात्रा का भी मौन साक्षी बनेगा।
जब पहली बार मिला ‘घोड़ा छाप’
समय आगे बढ़ा और चुनावी मैदान में माधव बाबू का प्रवेश हुआ। उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। चुनाव आयोग से उन्हें चुनाव चिन्ह मिला — “घोड़ा छाप”।
चुनाव प्रचार के क्रम में जब माधव बाबू पहली बार खैराचातर पहुंचे और पिताजी से उनकी मुलाकात हुई, तब बातचीत के दौरान यह बात सामने आई कि उनका चुनाव चिन्ह घोड़ा है।
पिताजी यह सुनकर भीतर गए और घर में सुरक्षित रखा वही रथ का लकड़ी का घोड़ा निकाल लाए। उन्होंने बड़े विश्वास और आत्मीयता के साथ वह घोड़ा माधव बाबू को सौंपते हुए कहा —
“यह रथ का घोड़ा है। इसे अपने वाहन में रख लीजिए। इसे साथ रखने वाला पराजित नहीं हो सकता।”
यह किसी अंधविश्वास की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि एक शुभेच्छु का विश्वास, आशीर्वाद और मन की शक्ति थी।
माधव बाबू ने भी उस भावना का सम्मान किया। उन्होंने वह घोड़ा अपने चुनाव प्रचार वाहन में रख लिया। चुनाव अभियान चलता रहा और अंततः वे अपना पहला चुनाव जीत गए।
संयोग था या विश्वास की शक्ति — यह कहना कठिन है, लेकिन उस जीत ने उस घोड़े और उससे जुड़ी स्मृति को हमेशा के लिए विशेष बना दिया।
वापस लौटा घोड़ा, पर बन गया स्थायी रिश्ता
चुनाव जीतने के कुछ दिन बाद माधव बाबू स्वयं घर आए। उन्होंने पिताजी के प्रति आभार व्यक्त किया और पूरे सम्मान के साथ वह रथ का घोड़ा वापस लौटा दिया।
लेकिन उस दिन केवल घोड़ा ही वापस नहीं लौटा। उस दिन दो परिवारों के बीच एक ऐसा रिश्ता स्थापित हुआ, जिसमें औपचारिकता नहीं थी, केवल आत्मीयता थी।
यही वह क्षण था, जिसके बाद माधव बाबू और मेरे पिता के बीच एक मधुर और आत्मिक संबंध जीवन भर बना रहा।
दिलचस्प बात यह भी रही कि बाद के चुनावों में माधव बाबू को अलग-अलग चुनाव चिन्ह मिले, लेकिन जनता की स्मृति में वे हमेशा “घोड़ा छाप वाले माधव बाबू” ही बने रहे। घोड़ा छाप जैसे उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन गया था।
नेता नहीं, परिवार के सदस्य की तरह
राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करने के बावजूद माधव बाबू ने कभी रिश्तों की गरमाहट को कम नहीं होने दिया। हमारे परिवार के सुख-दुख में उनकी सहभागिता हमेशा बनी रही। कोई पारिवारिक आयोजन हो, विशेष अवसर हो या संकट की घड़ी — वे औपचारिक नेता की तरह नहीं, बल्कि परिवार के अभिन्न सदस्य की तरह साथ खड़े दिखाई देते थे।
पिछले वर्ष जब बड़े भैया के अस्वस्थ होने की खबर उन्हें मिली, तो वे स्वयं घर आकर उनका हालचाल लेने पहुंचे। उन्होंने न केवल हौसला बढ़ाया, बल्कि शीघ्र स्वास्थ्य लाभ का स्नेहभरा आशीर्वाद भी दिया।
यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी — लोगों के जीवन में केवल नाम मात्र से नहीं, बल्कि दिल से उपस्थित रहना। आज के दौर में, जब राजनीतिक संबंध अक्सर औपचारिकता और दूरी तक सीमित हो जाते हैं, माधव बाबू का यह सहज और आत्मीय व्यवहार उन्हें भीड़ से अलग पहचान देता था। उनके लिए संबंध केवल सामाजिक या राजनीतिक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा मूल्य थे।
छठ का प्रसाद और अंतिम आगमन
इस वर्ष घर में कई वर्षों बाद छठ पूजा का आयोजन हुआ था। स्वाभाविक रूप से माधव बाबू को भी प्रसाद ग्रहण करने का आमंत्रण दिया गया। पूजा के दिन वे किसी कारणवश नहीं आ सके, लेकिन उनकी आत्मीयता देखिए, उन्होंने स्वयं फोन कर कहा —
“आज नहीं पहुंच पाऊंगा, लेकिन प्रसाद खाने जरूर आऊंगा।”
और उन्होंने अपना वादा निभाया। तीन नवंबर को वे घर पहुंचे। वही सहज मुस्कान, वही अपनापन और वही स्नेहिल व्यवहार। उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से छठ का प्रसाद ग्रहण किया, घर के सभी लोगों से मिले और काफी देर तक बैठकर हालचाल व बातचीत करते रहे।
उस दिन घर का माहौल किसी औपचारिक मुलाकात का नहीं, बल्कि अपने किसी प्रिय अभिभावक के आगमन जैसा था। लेकिन किसे पता था कि यह हमारे घर में माधव बाबू का अंतिम आगमन साबित होगा।
आज जब उस दिन को याद करता हूं तो मन बार-बार ठहर जाता है। लगता है, वे केवल प्रसाद ग्रहण करने नहीं आए थे, मानो अनजाने में किसी अंतिम आत्मीय मुलाकात और मौन विदाई की परंपरा निभाने आए हों। यही स्मृति अब मन में गहरे तक दर्ज होकर रह गई है।
प्रहरी मेला और अधूरी प्रतीक्षा
15 मार्च को आयोजित प्रहरी मेला में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। लेकिन उस समय वे दिल्ली में थे। फोन पर उन्होंने बताया — तबीयत ठीक नहीं है, कुछ जांचें होनी हैं, इसलिए कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाएंगे। फिर भी उन्होंने भरोसा दिलाया —
“लौटकर आऊंगा, सबसे मिलूंगा।”
मैंने भी सहजता से कहा —
“पहले इलाज कराइए और स्वस्थ होकर लौटिए। मेला तो आता रहेगा।”
उन्होंने अपने चिरपरिचित स्नेह और अपनत्व के साथ ढेर सारा आशीर्वाद दिया। उस समय यह एक सामान्य बातचीत लगी थी, जैसे स्वस्थ होकर लौटने के बाद फिर मुलाकात होगी और बातें अधूरी नहीं रहेंगी।
लेकिन नियति ने शायद कुछ और ही तय कर रखा था।
आज यही स्मृति भीतर तक टीस देती है कि जिन्होंने लौटकर आने और सबसे मिलने का भरोसा दिया था, वे फिर कभी अपने गांव और लोगों के बीच लौट नहीं पाए। यह अधूरी प्रतीक्षा अब एक ऐसी कसक बन गई है, जो समय के साथ भी कम नहीं होती।
उफ़, भगवान! तुमने यह क्या किया…
अब जब पुराने घर की याद आती है, कोठा में रखा वह रथ का घोड़ा याद आता है, तो उसके साथ माधव बाबू की छवि भी सामने उभर आती है। कभी लगता है, जैसे वे फिर दरवाजे पर आएंगे, उसी सहज मुस्कान के साथ बैठेंगे और हालचाल पूछेंगे।
लेकिन फिर यथार्थ सामने आ खड़ा होता है।
कुछ लोग चले नहीं जाते, वे स्मृतियों में बस जाते हैं। माधव बाबू भी उन्हीं में से एक थे। उनका जाना केवल एक नेता का निधन नहीं, बल्कि आत्मीय रिश्तों के एक युग का अवसान है।
और मन अनायास कíह उठता है —
“उफ़, भगवान! तुमने यह क्या किया?”