लिट्टीपाड़ा की पहाड़िया महिलाएं बनी आत्मनिर्भरता की मिसाल, बोरा सिलाई से सशक्तिकरण की नई कहानी
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कोटालपोखर संवाददाता, पाकुड़। लिट्टीपाड़ा प्रखंड के सुदूरवर्ती और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहने वाली पहाड़िया जनजाति की महिलाएं अब स्वरोजगार से जुड़कर आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा रही हैं। कभी पारंपरिक खेती तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज अपने हुनर के दम पर आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।
इस बदलाव में गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने वर्ष 2019 से इन महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ने का कार्य शुरू किया। ट्रस्ट के सहयोग से महिलाओं को बोरा सिलाई का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके बाद उन्होंने इस काम को आजीविका का साधन बना लिया।

शुरुआत में केवल 15 महिलाओं को इस योजना से जोड़ा गया था, जिन्होंने जेएसएलपीएस के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त कर यह कार्य सीखा। कठिन पहाड़ी जीवन और सीमित संसाधनों के बावजूद इन महिलाओं ने अपने कौशल को निखारा और धीरे-धीरे इस कार्य में अपनी पहचान बनाई।
वर्तमान में यही महिलाएं मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत खाद्यान्न वितरण में उपयोग होने वाले बोरों की सिलाई और आपूर्ति कर रही हैं। महिलाओं के अनुसार, हर वर्ष लगभग 8 लाख 85 हजार बोरों की सिलाई की जाती है, जिससे करीब 80 से 90 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार हो रहा है।
इस कार्य से जुड़ी महिलाओं को नियमित आय का स्रोत मिला है, जिससे वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभा पा रही हैं और बच्चों की पढ़ाई व जरूरतों में भी सहयोग कर रही हैं।
दीदी रूबी पहाड़िन, चांदी पहाड़िन, मोनिका मालतो और सारा मालतो ने बताया कि पहले उनका जीवन पूरी तरह से पहाड़ी खेती पर निर्भर था, लेकिन अब स्वरोजगार ने उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला दिया है।
महिलाओं ने यह भी कहा कि यदि उन्हें आधुनिक सिलाई मशीनें और बेहतर तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो उत्पादन क्षमता और अधिक बढ़ सकती है। इससे अन्य महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ने के अवसर बढ़ेंगे।
लिट्टीपाड़ा के इन पहाड़ी क्षेत्रों में यह पहल महिलाओं के लिए न सिर्फ आय का साधन बनी है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल भी पेश कर रही है।
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