लिट्टीपाड़ा के चापा गांव में पेयजल संकट,डेढ़ किमी दूर झरने से पानी लाते हैं 200 ग्रामीण
आदिम जनजाति पहाड़िया बहुल गांव में तीन टोलों के बावजूद नल-जल की सुविधा नहीं, सड़क-बिजली की समस्या भी बरकरार

पाकुड़ संवाददाता। लिट्टीपाड़ा। प्रखंड की करमाटांड़ पंचायत का चापा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। आदिम जनजाति पहाड़िया बहुल इस गांव के करीब 200 ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल के लिए रोजाना करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पहाड़ी झरने तक जाना पड़ता है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि जिस झरने से ग्रामीण अपनी प्यास बुझाते हैं, उसी जलस्रोत पर जंगली और पालतू जानवर भी पानी पीते हैं। इसके बावजूद दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण ग्रामीण इसी पानी के सहारे जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
तीन टोलों में बसा गांव, कहीं नहीं नल-जल की सुविधा
ग्रामीण रमेश पहाड़िया, छोटा मेंसा पहाड़िया, अर्जुन पहाड़िया, सजनी पहाड़ीन, देवी पहाड़ीन, सुरजी पहाड़ीन और डोंबा पहाड़िया समेत अन्य ग्रामीणों ने बताया कि चापा गांव तीन टोलों में बसा है। इसके बावजूद किसी भी टोले में स्वच्छ पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है।

पानी की जरूरत पूरी करने के लिए महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को प्रतिदिन करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। सुबह से ही ग्रामीण पानी की व्यवस्था में जुट जाते हैं। गर्मी के दिनों में जलस्रोत तक पहुंचने और पर्याप्त पानी लाने की परेशानी और बढ़ जाती है।
प्यास बुझाने वाला झरना, जानवरों का भी सहारा
ग्रामीणों ने बताया कि जिस झरने के पानी का इस्तेमाल वे पीने और घरेलू कार्यों के लिए करते हैं, उसी स्थान पर जंगली और पालतू जानवर भी पानी पीते हैं। इससे जलस्रोत की स्वच्छता को लेकर ग्रामीणों में हमेशा चिंता बनी रहती है।
बारिश के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। आसपास की गंदगी और मिट्टी के पानी में मिल जाने से इसके दूषित होने की आशंका बढ़ जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसे पानी का इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है और जलजनित बीमारियों का खतरा बना रहता है।
पानी ढोने में बीत रहा रोज का समय
डेढ़ किलोमीटर दूर से पानी लाने की समस्या का सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। रोजाना पानी ढोने में काफी समय खर्च हो जाता है। इससे महिलाओं के घरेलू कामकाज और बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। वहीं, ग्रामीणों की आजीविका से जुड़े कार्यों पर भी इसका असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में ही स्वच्छ पेयजल की स्थायी व्यवस्था कर दी जाए तो उन्हें बड़ी राहत मिलेगी। लोगों को उम्मीद है कि संबंधित विभाग गांव की पेयजल समस्या का जल्द समाधान करेगा।
पेयजल के साथ सड़क और बिजली भी बनी परेशानी
ग्रामीणों के अनुसार, चापा गांव में सिर्फ पेयजल की समस्या ही नहीं है, बल्कि सड़क, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि आदिम जनजाति बहुल गांव होने के बावजूद विकास योजनाओं का अपेक्षित लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से गांव में जल्द स्थायी स्वच्छ पेयजल व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि गांव में नल-जल की सुविधा बहाल होने से महिलाओं और बच्चों को रोजाना डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय करने से मुक्ति मिलेगी। साथ ही दूषित पानी के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों के खतरे को भी कम किया जा सकेगा।
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