पाकुड़ में विकास के दावों की खुली पोल: सड़क नहीं होने से गर्भवती को खटिया पर 4 किलोमीटर ढोकर पहुंचाया मुख्य सड़क तक
विकास के दावों की खुली पोल: मासधारी गांव में सड़क के अभाव में गर्भवती को कंधों पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाने की मजबूरी

रिपोर्ट : निशांत कुमार सानू,
पाकुड़ संवाददाता/लिट्टीपाड़ा गांव तक सड़क नहीं, एंबुलेंस पहुंचने का रास्ता नहीं और आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं। पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड स्थित मासधारी गांव की यही बदहाल तस्वीर है। यहां सड़क के अभाव में आज भी खटिया ही एंबुलेंस बनी हुई है। गुरुवार को प्रसव पीड़ा से कराहती 25 वर्षीय गर्भवती महिला को परिजनों और ग्रामीणों ने करीब चार किलोमीटर तक खटिया पर ढोकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गयी। इस घटना ने एक बार फिर गांव में सड़क जैसी बुनियादी सुविधा की कमी और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है।
प्रसव पीड़ा से परेशान महिला, सड़क के इंतजार में बेबस ग्रामीण
गुरुवार को मासधारी गांव निवासी पीरका पहाड़िया की पत्नी बागी पहाड़िन को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी। महिला की स्थिति को देखते हुए परिजनों के सामने उसे जल्द अस्पताल पहुंचाने की चुनौती थी। लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में ग्रामीणों ने खटिया को ही एंबुलेंस बनाया। महिला को खटिया पर लिटाकर परिजन और ग्रामीण कंधों के सहारे करीब चार किलोमीटर की दूरी तय कर मुख्य सड़क तक पहुंचे। वहां से उसे अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गयी। प्रसव पीड़ा के बीच महिला को इस तरह दुर्गम रास्ते से ले जाना ग्रामीणों की मजबूरी और व्यवस्था की विफलता को बयां करता है।

चार किलोमीटर का रास्ता, हर आपात स्थिति में जान जोखिम में
ग्राम प्रधान बैदा पहाड़िया के अनुसार, गांव से मुख्य सड़क करीब चार किलोमीटर दूर है। सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ती है। लेकिन सबसे भयावह स्थिति तब होती है, जब किसी की तबीयत बिगड़ जाती है। गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हो, बुजुर्ग की हालत गंभीर हो या कोई दुर्घटना में घायल हो जाये, हर बार मरीज को खटिया पर ढोकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। ऐसे में इलाज तक पहुंचने में होने वाली देरी मरीज और परिजनों की चिंता बढ़ा देती है।
सड़क के दावों के बीच मासधारी की हकीकत
गांवों को सड़क से जोड़ने और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावों के बीच मासधारी आज भी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब गांव तक सड़क ही नहीं होगी, तो सरकारी एंबुलेंस और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं आखिर कैसे पहुंचेंगी? उन्होंने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से गांव तक सड़क निर्माण कराने की मांग की है, ताकि मरीजों को खटिया पर ढोने की मजबूरी खत्म हो सके।
कब खत्म होगी खटिया पर मरीज ढोने की मजबूरी?
मासधारी की यह घटना महज एक गर्भवती महिला की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे गांव की बदहाली की कहानी है। सड़क के अभाव में ग्रामीणों को आज भी मरीजों को कंधों पर उठाकर अस्पताल तक पहुंचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है। सवाल यह है कि आखिर कब तक मासधारी के ग्रामीण सड़क के इंतजार में खटिया को एंबुलेंस बनाते रहेंगे? क्या प्रशासन इस दर्दनाक तस्वीर के बाद गांव तक सड़क पहुंचाने की दिशा में ठोस पहल करेगा?
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