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हिंडाल्को की मनमानी नहीं चलेगी:सेरेंगदाग माइंस पर ग्रामीणों का गुस्सा,ऑफिस में तालाबंदी

हिंडाल्को की मनमानी नहीं चलेगी:सेरेंगदाग माइंस पर ग्रामीणों का गुस्सा,ऑफिस में तालाबंदी

घाघरा (गुमला), 27 सितंबर।
घाघरा प्रखंड के सेरेंगदाग माइंस इलाके में शनिवार को ग्रामीणों का गुस्सा हिंडाल्को कंपनी के खिलाफ फूट पड़ा। सड़क निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर ग्रामीणों, रैयतों और मजदूरों ने संयुक्त रूप से कंपनी के माइंस ऑफिस का ताला जड़ दिया और धरने पर बैठ गए। इस दौरान पहाड़ पर खड़े सैकड़ों ट्रक तालाबंदी में फंस गए और खनन व परिवहन की गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गईं।

ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक इलाके में पक्की सड़क का निर्माण नहीं होता और स्वास्थ्य, शिक्षा व पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उनका कहना है कि कंपनी पिछले 51 सालों से इलाके से बॉक्साइट का खनन कर रही है, लेकिन यहां की जनता आज भी उपेक्षा और बदहाली झेलने को मजबूर है।

सड़क की जर्जर स्थिति ने बढ़ाई मुश्किलें

ग्रामीणों ने बताया कि माइंस से लेकर गांव तक की सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं। गर्मियों में धूल से लोग बीमार पड़ते हैं तो बरसात में सड़कें तालाब जैसी बन जाती हैं। ग्रामीणों ने कहा कि इस बदतर स्थिति ने उनका जीवन असहनीय बना दिया है। कई बार ट्रक और छोटी गाड़ियां कीचड़ में फंस जाती हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में भी मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा पाता।

स्वास्थ्य सुविधा नाम मात्र की

ग्रामीणों ने कहा कि इलाके में स्वास्थ्य भवन तो बना है, लेकिन अस्पताल कभी चालू नहीं हुआ। न डॉक्टर हैं और न ही दवा उपलब्ध होती है। बीमार पड़ने पर मरीजों को खाट पर लादकर कई किलोमीटर पैदल घाघरा या आसपास के कस्बों तक ले जाना पड़ता है। महिलाओं ने बताया कि प्रसव के वक्त स्थिति और भी भयावह हो जाती है। कई बार एंबुलेंस खराब सड़क और ड्राइवर की अनुपलब्धता का बहाना बनाकर नहीं आती। नतीजतन, कई प्रसव रास्ते में ही हो जाते हैं और महिलाओं की जान तक चली जाती है।

शिक्षा और पानी की गंभीर समस्या

ग्रामीणों ने शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि इलाके में सिर्फ दो कमरों का एक छोटा सा स्कूल बना है, लेकिन वह भी अनुपयोगी है। वहां बच्चों की जगह मवेशी बंधे रहते हैं। ऐसे में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। वहीं पीने के पानी की समस्या और भी विकराल है। महिलाएं आज भी पहाड़ी झरनों से सिर पर मटके में पानी ढोने को मजबूर हैं।

महिलाओं का गुस्सा फूटा

आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हुईं। उनका कहना था कि अब वे खामोश नहीं रहेंगी। प्रसव जैसी संवेदनशील स्थिति में एंबुलेंस सुविधा तक नहीं मिलना, मातृ मृत्यु की घटनाएं और स्वास्थ्य सेवा का अभाव उनकी मजबूरी है, लेकिन अब वे इसे अपनी किस्मत मानकर नहीं बैठेंगी। उन्होंने दो टूक कहा कि जब तक बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तब तक वे खनन कार्य नहीं होने देंगी।

कंपनी पर ग्रामीणों का आरोप

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कंपनी केवल खनन और मुनाफा कमाने में व्यस्त है। दशकों से करोड़ों टन बॉक्साइट निकालने के बावजूद यहां की जनता को सड़क, अस्पताल, स्कूल और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं कराई गईं। यही कारण है कि जनता अब आर-पार के आंदोलन की राह पर उतर आई है।

ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से भी हस्तक्षेप करने की मांग की है ताकि उनकी मूलभूत समस्याओं का समाधान हो सके। फिलहाल, आंदोलन जारी है और माइंस इलाके में खनन-परिवहन पूरी तरह ठप हो चुका है।

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