
खरगे की टिप्पणी पर भड़की भाजपा, अमित शाह और नितिन नवीन ने कांग्रेस को घेरा
नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की पटना में की गई कथित अमर्यादित टिप्पणी को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर दिए गए बयान पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कड़ी आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं ने इसे राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ बताते हुए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। इस बयान के बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
मामला पटना में आयोजित एक कार्यक्रम का है, जहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सरकार पर कथित वोट चोरी के आरोप लगा रहे थे। इसी दौरान उन्होंने चुनावी अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों को जेल भेजने की बात कही। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की गई उनकी टिप्पणी विवाद का कारण बन गई। भाजपा ने बयान को अनुचित बताते हुए कांग्रेस नेतृत्व से राजनीतिक संवाद में मर्यादा बनाए रखने की अपेक्षा जताई है।
अमित शाह बोले- राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं लांघी गईं
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए खरगे की टिप्पणी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पटना में कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी के पिता के बारे में अभद्र टिप्पणी कर राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन किया है। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं की ओर से पहले भी प्रधानमंत्री और उनके परिवार को लेकर आपत्तिजनक बयान दिए जाते रहे हैं।

शाह ने अपने संदेश में प्रधानमंत्री की माता को लेकर पूर्व में हुई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध के दौरान व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों को उठाना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की राजनीति में लगातार कटुता बढ़ रही है।
गृह मंत्री ने कांग्रेस की चुनावी स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार चुनावी हार से पार्टी में निराशा बढ़ी है और वह नीतिगत मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत टिप्पणियों पर अधिक ध्यान दे रही है। शाह ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री और उनके परिवार को निशाना बनाकर की गई टिप्पणियों का जवाब जनता चुनावों में देती रही है।
नितिन नवीन ने बताया वैचारिक दिवालियापन
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी खरगे के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सार्वजनिक मंच से अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल कांग्रेस के वैचारिक दिवालियापन को दर्शाता है।
नवीन ने कहा कि राजनीतिक विरोध और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन इसकी भी एक सीमा और गरिमा होती है। उनके अनुसार, किसी नेता के दिवंगत परिजनों को राजनीतिक भाषणों में शामिल करना उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की टिप्पणी कांग्रेस की राजनीतिक सोच और उसके नेतृत्व की कार्यशैली को दर्शाती है।
भाजपा अध्यक्ष ने इस प्रकरण को केवल खरगे का व्यक्तिगत बयान मानने के बजाय कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति से जोड़कर पेश किया। उनके बयान के बाद भाजपा ने इस मुद्दे को सार्वजनिक विमर्श में राजनीतिक शिष्टाचार और नेताओं की जिम्मेदारी से जोड़ दिया है।
जेपी नड्डा ने भी जताई नाराजगी
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी खरगे की टिप्पणी की निंदा की। भाजपा नेताओं का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी भाषा और व्यवहार में संयम बनाए रखें। राजनीतिक मतभेदों को नीतियों, कार्यक्रमों और जनहित से जुड़े सवालों तक सीमित रखना लोकतांत्रिक संवाद के लिए जरूरी है।
भाजपा ने इस मामले को कांग्रेस की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया है। पार्टी नेताओं ने कहा कि विपक्ष को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन आलोचना के दौरान व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों से बचना चाहिए।
वोट चोरी के आरोप से शुरू हुआ विवाद
गौरतलब है कि कांग्रेस लगातार चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और वोट चोरी के मुद्दे को उठाती रही है। पटना के कार्यक्रम में भी खरगे सरकार पर इसी मुद्दे को लेकर निशाना साध रहे थे। उन्होंने कथित चुनावी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसी दौरान प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता को लेकर की गई टिप्पणी ने राजनीतिक बहस का रुख बदल दिया।
कांग्रेस का चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाना और भाजपा का इन आरोपों पर जवाब देना राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। हालांकि, इस विवाद में चर्चा का केंद्र चुनावी अनियमितताओं के आरोपों से हटकर नेताओं की भाषा और सार्वजनिक व्यवहार पर आ गया है।
राजनीतिक बयानबाजी में मर्यादा फिर चर्चा में
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल होने वाली भाषा और नेताओं की सार्वजनिक जिम्मेदारी को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस स्वाभाविक है। विपक्ष सरकार से जवाब मांग सकता है, जबकि सत्तारूढ़ दल विपक्ष के आरोपों का प्रतिवाद कर सकता है। लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियों के कारण नीतिगत मुद्दे पीछे छूटने की आशंका भी बनी रहती है।
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