रांची:ओबीसी के लिए अलग कोड की मांग, 16 सितंबर को बापू वाटिका से लोकभवन मार्च करेगी कांग्रेस
Jharkhand News (obc)

रांची। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए अलग कोड की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि देशभर में जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसमें पहले चरण में मकानों की गणना पूरी हो गई है और अब दूसरे चरण में व्यक्तियों की गणना की जाएगी। ऐसे में ओबीसी वर्ग की जातिगत पहचान और उनकी वास्तविक जनसंख्या का वैज्ञानिक आकलन बेहद जरूरी है।

प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि झारखंड जैसे राज्यों में जातिगत जनगणना के आंकड़े सामाजिक न्याय के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। राज्य में पिछड़े वर्गों की आबादी काफी अधिक है, लेकिन उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में अधिकार और हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने बताया कि मंडल आयोग की सिफारिश के आधार पर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन झारखंड के सात जिलों में यह आरक्षण शून्य होना गंभीर चिंता का विषय है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने मांग करते हुए कहा कि जनगणना प्रपत्र में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की तरह ओबीसी के लिए भी अलग कोड निर्धारित किया जाए। साथ ही, राज्यों में मान्यता प्राप्त पिछड़ी जातियों को सूचीबद्ध कर जनगणना में दर्ज किया जाए, ताकि उनकी सटीक संख्या सामने आ सके।
इसी मांग को लेकर 16 सितंबर को ओबीसी मोर्चा बापू वाटिका से लोकभवन तक मार्च करेगा और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपेगा। इसके अलावा खनिज संसाधनों से जुड़े मुद्दों और कथित चंदा चोरी के विरोध में 26 सितंबर को शहीद चौक से लोकभवन तक मार्च निकाला जाएगा। वहीं 5 से 10 अक्टूबर तक सभी प्रखंड मुख्यालयों में विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे।
कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि इस बार जनगणना में जाति दर्ज करने के लिए कोई पूर्व निर्धारित सूची या अलग कॉलम नहीं दिया गया है, बल्कि व्यक्ति को अपनी जाति स्वयं लिखनी होगी। इससे आंकड़ों की शुद्धता और पहचान को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
नवनियुक्त ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष निशांत जायसवाल ने कहा कि पिछड़े वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुरूप सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और आर्थिक हिस्सेदारी दिलाना सामाजिक न्याय की दिशा में जरूरी कदम है।
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यह मुद्दा केवल शहर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मेरे अनुभव में, ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति काफी भिन्न है।