संताल परगना में बच्चों के पोषण की स्थिति चिंताजनक,पाकुड़ में हर दो में से एक बच्चा कम वजन का
पाकुड़ में मामूली सुधार,फिर भी स्थिति गंभीर

पाकुड़ संवाददाता। संताल परगना में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के पोषण की स्थिति को लेकर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। एनएफएचएस-5 की तुलना में एनएफएचएस-6 में संताल परगना के छह जिलों में से तीन जिलों में अंडरवेट बच्चों का अनुपात बढ़ा है, जबकि दो जिलों में सुधार दर्ज किया गया है। पाकुड़ में मामूली कमी के बावजूद स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है।
छह जिलों के आंकड़ों का औसत देखें तो एनएफएचएस-5 में अंडरवेट बच्चों का अनुपात 44.15 प्रतिशत था, जो एनएफएचएस-6 में बढ़कर 46.28 प्रतिशत हो गया। यानी औसतन 2.13 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे अधिक वृद्धि देवघर में हुई, जहां यह आंकड़ा 36.9 प्रतिशत से बढ़कर 47.5 प्रतिशत हो गया। यहां 10.6 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज की गयी।
पाकुड़ में मामूली सुधार,फिर भी स्थिति गंभीर
पाकुड़ में अंडरवेट बच्चों के अनुपात में मामूली सुधार हुआ है। एनएफएचएस-5 में जिले में 51.4 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट थे, जो एनएफएचएस-6 में घटकर 50.2 प्रतिशत रह गया। यानी 1.2 प्रतिशत अंक की कमी हुई। हालांकि, आंकड़ा अब भी 50 प्रतिशत से अधिक है। इसका मतलब है कि पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग हर दो बच्चों में से एक बच्चा कम वजन का है।
वहीं साहिबगंज में स्थिति खराब हुई है। यहां अंडरवेट बच्चों का अनुपात 44.8 प्रतिशत से बढ़कर 47.6 प्रतिशत हो गया। गोड्डा में यह आंकड़ा 40.7 प्रतिशत से बढ़कर 46.5 प्रतिशत और देवघर में 36.9 प्रतिशत से बढ़कर 47.5 प्रतिशत पहुंच गया।
दुमका में सबसे बेहतर सुधार
छह जिलों में दुमका में अंडरवेट बच्चों के अनुपात में सबसे बेहतर सुधार दर्ज किया गया है। एनएफएचएस-5 में यहां यह आंकड़ा 44.9 प्रतिशत था, जो एनएफएचएस-6 में घटकर 40.5 प्रतिशत हो गया। यानी 4.4 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज की गयी।
जामताड़ा में भी मामूली सुधार हुआ है। यहां अंडरवेट बच्चों का अनुपात 46.2 प्रतिशत से घटकर 45.4 प्रतिशत हो गया। हालांकि, कमी के बावजूद यह आंकड़ा अब भी काफी अधिक है।
पोषण योजनाओं के असर पर उठ रहे सवाल
अंडरवेट बच्चों का आंकड़ा केवल भोजन की मात्रा से जुड़ा विषय नहीं है। उम्र के अनुपात में कम वजन बच्चों में अल्पविकास, दुबलापन या दोनों से जुड़ा हो सकता है। इसके पीछे भोजन की उपलब्धता, बार-बार होने वाले संक्रमण और बीमारियां, मातृ पोषण तथा जीवन के शुरुआती वर्षों में मिलने वाली देखभाल जैसे कई कारण हो सकते हैं।
संताल परगना के जिलों में आंकड़ों का अलग-अलग रुख सरकारी पोषण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। जिन जिलों में अंडरवेट बच्चों का अनुपात घटा है, वहां कौन से स्थानीय प्रयास प्रभावी रहे और जिन जिलों में बढ़ोतरी हुई, वहां पोषण योजनाओं का अपेक्षित असर क्यों नहीं दिखा, इसकी जिला स्तर पर समीक्षा जरूरी है।
एक जैसी योजनाएं, फिर परिणाम अलग क्यों?
एनएफएचएस-6 के आंकड़े संताल परगना में बच्चों के पोषण की एक समान तस्वीर पेश नहीं करते। पाकुड़ में अनुपात सबसे अधिक है, हालांकि मामूली सुधार हुआ है। देवघर में सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गयी, जबकि दुमका में सबसे अधिक सुधार हुआ।
ऐसे में पूरे संताल परगना को एक ही पैमाने पर देखने के बजाय जिला स्तर पर बच्चों की नियमित वृद्धि निगरानी, पूरक पोषण और अन्य पोषण सेवाओं के वास्तविक प्रभाव की समीक्षा आवश्यक है। छह जिलों में समान सरकारी योजनाएं संचालित होने के बावजूद परिणामों में इतना अंतर क्यों है, यह अहम सवाल है।
जागरूकता की कमी भी बड़ी चुनौती
पाकुड़ की जिला समाज कल्याण पदाधिकारी बसंती ग्लाडिस बाड़ा ने कहा कि जिले में कुपोषण कम करने के लिए लगातार काम किया जा रहा है और इससे स्थिति में धीरे-धीरे सुधार भी हो रहा है। बेहतर परिणाम के लिए कैंप आयोजित किये जा रहे हैं। जमीनी स्तर पर पोषण सेवाओं को और प्रभावी बनाने के लिए सेविका-सहायिकाओं को प्रशिक्षण देने की दिशा में भी काम चल रहा है।
उन्होंने कहा कि जिले के कई क्षेत्रों में अभिभावकों में जागरूकता की कमी है। कामकाज में व्यस्तता के कारण भी कई माता-पिता बच्चों के पोषण और देखभाल पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे पाते हैं। अभिभावकों को जागरूक करने के लिए विभाग की ओर से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं।
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