अमीन अंसारी
रांची :- पूरा झारखंड अपनी स्थापना का 25वां जश्न मना रहा है. यहां के अख़बारों के पन्ने झारखंड की इतिहास-गाथा से भरे पड़े हैं. लेकिन अलग झारखंड राज्य के लिए जिसने सबसे पहले आवाज़ उठाई, वो आज एक सिरे से गायब हैं.
झारखंड राज्य के इतिहास की बात करें तो सबसे पहले असमत अली ने अलग झारखंड राज्य की मांग उठाई थी. ये सन् 1912 की बात है. बिहार जब बंगाल से अलग हुआ था, तो उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग की थी. असमत अली इस हुकूमत में एक मुलाज़िम थे.
इसकी चर्चा अबरार ताबिन्दा ने अपनी पुस्तक ‘झारखंड आंदोलन में मुसलमानों की भागीदारी’ में विस्तृत रूप से की है. उससे पहले धरती आबा बिरसा मुंडा या तिलका मांझी आदि वीरों ने जल, जंगल और ज़मीन पर अपने अधिकार की बात ज़रूर की थी. उसके लिए बलिदान तक दिया था. लेकिन अलग राज्य की कोई सुनिश्चित कल्पना तब तक सामने नहीं आई थी.
मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने बहुत बाद में आदिवासी महासभा के बैनर तले अलग झारखंड की आवाज़ उठाई. 1936 में मोमिन कांफ्रेंस ने भी अलग झारखंड राज्य के गठन का न सिर्फ़ प्रस्ताव पास किया, बल्कि 1937 में ठेबले उरांव के नेतृत्व में आदिवासी उन्नत समाज का खुलकर साथ दिया. वहीं 1937 में टाटा औद्योगिक घराने के एक मुलाज़िम रफ़ीक़ ने त्रिपुरा कांग्रेस में बिहार के पठारी क्षेत्र को अलग राज्य बनाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था.
आदिवासी महासभा के दस्तावेज़ों के अनुसार 1938 में तक़रीबन 7 लाख मुसलमान महासभा के साथ थे, जो झारखंड के आन्दोलन में हमेशा साथ खड़े रहें. आज़ादी के बाद भी मुस्लमान इस पूरे आन्दोलन में जयपाल सिंह के साथ खड़े रहें.
1952 में चिराग़ अली शाह ने भी अलग झारखंड राज्य की मांग को पूरा करने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की. 1962 में जयपाल सिंह के साथ मिलकर ज़हूर अली ने ‘जोलहा-कोलहा, भाई-भाई’ का नारा दिया.
1983 में दुमका में ‘झारखंड दिवस’ मनाने के जुर्म में अबू तालिब अंसारी की गिरफ़्तारी हुई. आप झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता थे. 1989 में इन्हें केन्द्रीय समिति का सचिव बनाया गया. इसी साल राजीव गांधी ने ‘कमिटी ऑन झारखंड मेटर्स’ बनाया, जिसके तहत दिल्ली जाकर बातचीत करने वालों में अबू तालिब अंसारी के साथ आजसू से जुडें मुस्लिम लीडर भी शामिल थे.
इस दौर में कांग्रेस के सरफ़राज़ अहमद भी अलग झारखंड राज्य के हक़ में खुलकर बयान देते रहें. मिल्लत क्लब रांची के अध्यक्ष मुन्ना वारसी झारखंड आंदोलनकारियों को आर्थिक सहयोग और भीड़ उपलब्ध कराते थे।
यही नहीं, मुसलमानों ने झारखंड के लिए क़ुर्बानियां भी दीं. 21 जनवरी, 1990 में खेलारी में अशरफ़ खां, 4 जून, 1992 को कंटाडीह सोनाटी, टाटा के मो. शाहिद एवं आदित्यपुर जमशेदपुर के मो. जुबैर, 18 मार्च, 1993 को कोटशीला के वहाब अंसारी, शेख़ कुतबुद्दीन, मिदनापुर सिंहभूम के इस्लाम अंसारी और 1998 में चक्रधरपुर के मुर्तजा अंसारी ने नाकाबंदी के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार होकर अपनी जान झारखंड के लिए क़ुर्बान कर दी.
मुसलमान हर तरह से झाखंड को अलग राज्य बनाने के में पूरी तरह से सबके साथ खड़ा रहा है.
अल्पसंख्यक मामलों के जानकार एस अली बताते हैं कि, झारखंड आंदोलन में मुसलमानों की सबसे अहम भूमिका रही है,
परंतु राज्य बनने के बाद आर्थिक और राजनीतिक नुक़सान सबसे अधिक मुसलमानों को उठाना पड़ रहा है. न असमत अली की कोई चर्चा करता है और न ही रफ़ीक़ की, बाद के आंदोलनकारियों की बात ही छोड़ दीजिए.
एस अली बताते हैं कि, राज्य में 15% यानि 50 लाख से अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद लोकसभा से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है, वही 2024 के विधानसभा चुनाव में आबादी के अनुपात में 81 विधानसभा सीट में जेएमएम कांग्रेस राजद वामदल से 12 टिकट मिलनी चाहिए।
लेकिन जेएमएम कांग्रेस ने मात्र 05 टिकट दिया जो पिछले बार से 03 टिकट कम है, वही आजसू पार्टी जो 10 सीट पर विधानसभा लड़ रही है उसने एक सीट से मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है.
संयुक्त बिहार में इस क्षेत्र से मुसलमानों का प्रतिनिधित्व दोनों जगह आज की तुलना में काफी बेहतर था.
झारखंड बनने के बाद सरकारी नौकरी, रोजगार और विकास के मामले पर हमारे साथ भेदभाव बढ़े है और बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने रोजगार हेतु दूसरे राज्य पलायन किया है,
ना ही हमारे संवैधानिक अधिकार मिल पा रही है और ना ही आबादी के अनुपात सभी जगहों पर भागीदारी, पिछले 05 वर्षों में 42 से अधिक माॅबलिंचिग हुई है अधिक्तर पीड़ितों के न्याय और मुवाअजा नही मिला और ना माॅबलीचिंग रोकने के लिए कानून बना,
इस्लाम धर्म के पैगंबर पर टिप्पनी करने वाले के खिलाफ 10 जून 2022 को रांची में निकले मार्च पर पुलिस की गोली से दो युवकों की मौतऔर 09 घायल हुए और इनपर ही कार्रवाई हो गया गया, 543 उर्दू प्राइमर व मिडिल स्कूलों का उर्दू स्टेटस छीनकर सामान्य विद्यालय बना दिया और जुमा के रोज होने वाले सप्ताहिक छुट्टी को समाप्त कर दिया गया.
बिहार सरकार से मिले 4401 उर्दू सहायक शिक्षक के बचे बैकलॉग 3712 पदों को झारखंड अल्पसंख्यक आयोग आदेशवाद 746/2015 के अनुसार उर्दू टेट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों से भरने के बजाए सभी पदों को गलत तरीके से सरेंडर कर दिया गया।
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद +2 स्कूलों में उर्दू टीचर के पद नही दिये गये. मान्यता व गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के कई मामलें शिक्षा विभाग और जैक में लटके रहे. अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम, राज्य हज समिति, मदरसा बोर्ड, उर्दू एकेडमी का गठन नही हुआ,
सरकार ने चार साल देर से 15 सुत्री समिति का गठ़न किया और एक भी प्रस्ताव केन्द्र सरकार को नही भेजा जिसके कारण केन्द्रीय राशि से मुस्लिम समुदाय
वंचित हो गए.
मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत इस वर्ष 2024 में आवेदन किए मुस्लिम युवको को ऋण देने हेतू 239 करोड की राशि का मांग था लेकिन सरकार ने मात्र 25 करोड़ आवंटित किया जिसका जिलावार वितरण भी नही हो पाया।
अल्पसंख्यक समुदाय के शैक्षणिक समाजिक और उनक क्षेत्र में विकास हेतू सरकार द्वारा आबादी के अनुपात में बजट भी आवंटित नही किया जाता.
मुस्लिम अफसर के पदास्थापन स्थांतरण में भेदभाव किया गया।