सड़क नहीं,तो एंबुलेंस भी बेबस! प्रसव पीड़ा से तड़पती रही गर्भवती, चार किलोमीटर तक खाट पर ढोकर अस्पताल ले गए ग्रामीण
बोरियो के पोड़ैया बेड़ो गांव की बदहाली उजागर, कीचड़ भरे रास्ते से टोटो तक पहुंचाई गई महिला; कई बार आवेदन और आंदोलन के बावजूद नहीं बनी सड़क

सड़क नहीं, तो एंबुलेंस भी बेबस! प्रसव पीड़ा से तड़पती रही गर्भवती, चार किलोमीटर तक खाट पर ढोकर अस्पताल ले गए ग्रामीण

बोरियो संवाददाता निशांत कुमार सानू। गांव तक पक्की सड़क नहीं, एंबुलेंस की पहुंच नहीं और प्रसव पीड़ा से जूझती गर्भवती महिला। झारखंड के साहिबगंज जिले के बोरियो प्रखंड अंतर्गत मोतीपहाड़ी बड़ा पंचायत के पोड़ैया बेड़ो गांव की यह तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। गांव की 19 वर्षीय गर्भवती सुकुरमुनी पहाड़िन को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को खाट का सहारा लेना पड़ा। करीब चार किलोमीटर तक कीचड़ भरे कच्चे रास्ते पर महिला को कंधों पर ढोने के बाद ग्रामीणों ने टोटो की मदद से उन्हें बोरियो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया।
यह घटना बताती है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन जाता है।
108 एंबुलेंस को किया फोन, लेकिन गांव तक नहीं पहुंच सका वाहन
जानकारी के अनुसार, पोड़ैया बेड़ो गांव निवासी बुधना पहाड़िया की पत्नी सुकुरमुनी पहाड़िन को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। परिजनों ने तत्काल 108 एंबुलेंस सेवा को फोन कर मदद मांगी, ताकि गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सके। लेकिन गांव तक पक्की सड़क नहीं होने और रास्ते की बदहाल स्थिति के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी।
ऐसी स्थिति में ग्रामीणों ने खाट का इंतजाम किया और महिला को उस पर लिटाकर अस्पताल की ओर निकल पड़े। कीचड़ और फिसलन से भरे दुर्गम रास्ते पर करीब चार किलोमीटर तक ग्रामीण महिला को कंधों पर उठाकर चलते रहे। काफी मशक्कत के बाद वे पोड़ैया संथाली गांव पहुंचे, जहां से टोटो के जरिए महिला को बोरियो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।
प्रसव जैसी आपात स्थिति में एक गर्भवती महिला को इस तरह अस्पताल पहुंचाने की मजबूरी ने गांव की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति उजागर कर दी है।
कई बार आवेदन, आंदोलन भी किया, फिर भी नहीं बनी सड़क
ग्राम प्रधान चांदू मालतो के अनुसार, पोड़ैया बेड़ो गांव आज तक पक्की सड़क से नहीं जुड़ सका है। बरसात के दिनों में कच्चा रास्ता कीचड़ से भर जाता है और फिसलन के कारण गांव से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता है। इसका असर केवल मरीजों पर ही नहीं, बल्कि स्कूली बच्चों और रोजमर्रा के काम से बाहर जाने वाले ग्रामीणों पर भी पड़ता है।
उन्होंने बताया कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीण कई बार प्रखंड से लेकर जिला स्तर तक आवेदन दे चुके हैं। अपनी मांगों को लेकर आंदोलन भी किया गया, लेकिन अब तक सड़क निर्माण की समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
ग्रामीणों का कहना है कि हर बरसात में उन्हें इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सड़क नहीं होने के कारण आपात स्थिति में समय पर चिकित्सा सुविधा प्राप्त करना भी कठिन हो जाता है।
सड़क के अभाव ने खोली ग्रामीण व्यवस्था की पोल
गर्भवती महिला को चार किलोमीटर तक खाट पर ढोकर अस्पताल पहुंचाने की घटना ने एक बार फिर सुदूर पहाड़िया बहुल गांवों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयासों के बीच ऐसी घटनाएं जमीनी स्तर पर मौजूद चुनौतियों को सामने लाती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी गांव तक पक्की सड़क ही नहीं पहुंचेगी, तो आपात स्थिति में एंबुलेंस और दूसरी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ग्रामीणों को समय पर कैसे मिलेगा? गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों के लिए ऐसी परिस्थितियां विशेष रूप से कठिन हो सकती हैं।
प्रशासन से जल्द सड़क निर्माण की मांग
पोड़ैया बेड़ो गांव के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गांव तक जल्द पक्की सड़क बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि वर्षों से चली आ रही इस समस्या का स्थायी समाधान जरूरी है, ताकि किसी भी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए खाट और कंधों का सहारा न लेना पड़े।
अब देखना होगा कि इस घटना के बाद संबंधित विभाग और जिला प्रशासन ग्रामीणों की मांग पर क्या कदम उठाते हैं। फिलहाल, पोड़ैया बेड़ो गांव की यह घटना बुनियादी सुविधाओं की जरूरत और ग्रामीणों की परेशानी को गंभीरता से लेने की मांग करती है।
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