टीचर की पिटाई से 6 साल के बच्चे की मौत,स्कूलों में शारीरिक दंड पर क्या है कानून?
होमवर्क नहीं करने पर पिटाई का आरोप, विशाखापट्टनम की घटना के बाद स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर उठे सवाल

विशाखापट्टनम में छह साल के बच्चे की स्कूल में संदिग्ध मौत के मामले ने स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड देने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों ने आरोप लगाया है कि होमवर्क पूरा नहीं करने पर शिक्षिका ने बच्चे की पिटाई की, जिसके बाद वह कक्षा में गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से मौत की वास्तविक वजह स्पष्ट होने की उम्मीद है।

स्कूल में बच्चे की पिटाई पर क्या कहता है कानून?
भारत में स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 17(1) के तहत किसी बच्चे को शारीरिक दंड या मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती। इसका उल्लंघन होने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ लागू सेवा नियमों के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने भी स्कूलों में शारीरिक दंड समाप्त करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। आयोग की मौजूदा गाइडलाइंस में बच्चों की सुरक्षा और स्कूलों में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है।
क्या शिक्षक की पिटाई पर आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है?
यदि पिटाई से बच्चे को गंभीर चोट पहुंचती है या उसकी मौत हो जाती है, तो मामला केवल स्कूल के अनुशासनात्मक नियमों तक सीमित नहीं रहता। घटना के तथ्यों, चोट, मंशा और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अन्य लागू आपराधिक धाराओं के तहत कार्रवाई कर सकती है। इसलिए किसी भी मामले में अंतिम कानूनी जिम्मेदारी जांच और साक्ष्यों के आधार पर तय होती है।
साइकोमैट्रिक टेस्ट क्यों जरूरी?
बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों में धैर्य, भावनात्मक नियंत्रण और बच्चों के व्यवहार को समझने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन या उपयुक्त मनोवैज्ञानिक स्क्रीनिंग से ऐसे व्यवहार संबंधी जोखिमों की पहचान में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी शिक्षक के बारे में केवल टेस्ट के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह बच्चे को नुकसान पहुंचाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत केवल टेस्ट की नहीं, बल्कि शिक्षकों की नियमित काउंसलिंग, सकारात्मक अनुशासन की ट्रेनिंग, स्कूलों में शिकायत व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी निगरानी की भी है।
स्कूल में अनुशासन के नाम पर मारपीट स्वीकार्य नहीं है। बच्चों को डराकर नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में शिक्षा देना ही उचित व्यवस्था है।
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