मां तारा की पुनर्प्रतिष्ठा से पहले विश्वशांति के लिए भव्य महायज्ञ, विधायक रत्ना देवनाथ और कार्तिक महाराज समेत देशभर के साधु-संत जुटे
डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से हुआ तारापीठ मंदिर का जीर्णोद्धार, गीता पाठ, चंडी पाठ और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुआ महायज्ञ

नलहाटी। रिपोर्ट : निशांत कुमार सानू
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित विश्वप्रसिद्ध तारापीठ मंदिर जीर्णोद्धार के बाद भव्य और आकर्षक स्वरूप में तैयार हो गया है। करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से जगन्नाथ राय परिवार की विशेष पहल पर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया है। मंदिर के इस ऐतिहासिक स्वरूप के तैयार होने के बाद मां तारा की गर्भगृह में पुनर्प्रतिष्ठा से पहले विश्वशांति और जनकल्याण की कामना को लेकर भव्य महायज्ञ एवं हवन का आयोजन किया गया।

तारापीठ धाम में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार, गीता पाठ और चंडी पाठ से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे साधु-संतों, धर्माचार्यों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष बना दिया।
वैदिक मंत्रोच्चार और चंडी पाठ से गूंजा तारापीठ धाम
तारापीठ मंदिर समिति, जगन्नाथ राय परिवार और एसडी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित महायज्ञ में धार्मिक परंपराओं और वैदिक विधि-विधान का विशेष ध्यान रखा गया। मां तारा की पुनर्प्रतिष्ठा से पूर्व मंदिर परिसर में गीता पाठ, चंडी पाठ और वैदिक मंत्रोच्चार किया गया। इसके बाद विद्वान पुरोहितों की देखरेख में विधिवत महायज्ञ एवं हवन संपन्न कराया गया।

महायज्ञ में शामिल श्रद्धालुओं ने यज्ञकुंड में आहुतियां अर्पित कर मां तारा से विश्वशांति, सुख-समृद्धि और मानव कल्याण की प्रार्थना की। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धा और भक्ति का विशेष माहौल बना रहा।
विधायक रत्ना देवनाथ और कार्तिक महाराज समेत कई संत हुए शामिल
इस भव्य धार्मिक आयोजन में पानीहाटी की विधायक रत्ना देवनाथ और कार्तिक महाराज की विशेष उपस्थिति रही। इनके अलावा देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मठों और मंदिरों से पहुंचे साधु-संत, धर्माचार्य, विद्वान तथा तारापीठ मंदिर समिति के प्रमुख पदाधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।
बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन की भव्यता को और बढ़ा दिया। मंदिर के जीर्णोद्धार पर करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। जगन्नाथ राय परिवार की पहल से संपन्न यह कार्य तारापीठ मंदिर के धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप को नया आयाम देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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