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यश की ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल और एक्शन का ओवरडोज, कहानी ने किया निराश

मूवी रिव्यू – ‘टॉक्सिक’: यश की फिल्म में स्टाइल, स्टारडम और एक्शन का ओवरडोज, लेकिन कहानी उलझी

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यश की ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल और एक्शन का ओवरडोज, कहानी ने किया निराश

फिल्म: टॉक्सिक
कलाकार: यश, नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, अक्षय ओबेरॉय
निर्देशक: गीतू मोहनदास
शैली: एक्शन, क्राइम, ड्रामा
रेटिंग: ⭐⭐½/5

फिल्म रिव्यू: दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार यश की फिल्म ‘टॉक्सिक’ रिलीज से पहले ही काफी चर्चा में रही है। फिल्म से दर्शकों को बड़े स्तर का एक्शन, शानदार विजुअल्स और यश का दमदार अंदाज देखने की उम्मीद थी। फिल्म इन उम्मीदों पर कुछ हद तक खरी उतरती भी है। इसमें यश का स्टारडम, जबरदस्त एक्शन, स्टाइलिश सिनेमैटोग्राफी और शानदार बैकग्राउंड म्यूजिक देखने को मिलता है। लेकिन समस्या यह है कि इन खूबियों के बीच फिल्म की कहानी कई जगह कमजोर और उलझी हुई महसूस होती है। करीब तीन घंटे की लंबी फिल्म में कई ऐसे हिस्से हैं, जिन्हें छोटा किया जा सकता था।

कैसी है फिल्म की कहानी?

‘टॉक्सिक’ की कहानी अपराध, परिवार, सत्ता, महत्वाकांक्षा और बदले के इर्द-गिर्द घूमती है। यश एक ऐसे किरदार की भूमिका में हैं, जिसकी जिंदगी सामान्य नहीं है। उसके आसपास अपराध की दुनिया है और उसके फैसले कहानी को लगातार एक नए मोड़ की तरफ ले जाते हैं।

यश की ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल और एक्शन का ओवरडोज, कहानी ने किया निराश

फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसमें नए किरदार और नई परिस्थितियां जुड़ती जाती हैं। शुरुआत में कहानी रहस्य पैदा करती है और दर्शक यह जानना चाहता है कि आखिर मुख्य किरदार की असली मंजिल क्या है। लेकिन बाद के हिस्से में कहानी कई दिशाओं में बंटती हुई नजर आती है।

निर्देशक ने कहानी को साधारण तरीके से बताने के बजाय इसे स्टाइलिश और अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। यही प्रयोग फिल्म की खूबी भी है और कमजोरी भी। जिन दर्शकों को तेज और स्पष्ट कहानी पसंद है, उनके लिए कई हिस्से भ्रम पैदा कर सकते हैं।

यश की स्क्रीन प्रेजेंस शानदार

फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण यश हैं। उनकी स्क्रीन एंट्री से लेकर एक्शन सीक्वेंस तक, फिल्म में उनके स्टारडम को पूरी तरह इस्तेमाल किया गया है। उनका लुक, डायलॉग डिलीवरी, बॉडी लैंग्वेज और एक्शन अंदाज उनके प्रशंसकों को खासा पसंद आ सकता है।

यश अपने किरदार में काफी आत्मविश्वास के साथ नजर आते हैं। कई दृश्यों में कहानी कमजोर पड़ने के बावजूद उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को संभालती दिखाई देती है। उनके फैंस के लिए फिल्म में कई ऐसे पल हैं, जिन पर थिएटर में तालियां और सीटियां सुनाई दे सकती हैं।

हालांकि समस्या यह है कि कई बार ऐसा लगता है कि किरदार को मजबूत बनाने के बजाय केवल यश के स्टारडम पर ज्यादा भरोसा किया गया है। अगर कहानी और किरदार की भावनात्मक गहराई पर थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म का प्रभाव ज्यादा मजबूत हो सकता था।

एक्शन है फिल्म की बड़ी ताकत

‘टॉक्सिक’ में एक्शन की कोई कमी नहीं है। बड़े सेट, हाई-ऑक्टेन एक्शन सीक्वेंस, स्टाइलिश कैमरा वर्क और दमदार बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को बड़े पर्दे का अनुभव देते हैं।

कई एक्शन दृश्य तकनीकी रूप से शानदार हैं। फिल्म का प्रोडक्शन स्केल भी बड़ा दिखाई देता है। स्क्रीन पर कई दृश्य काफी भव्य लगते हैं और यश को एक्शन करते देखना उनके प्रशंसकों के लिए निश्चित तौर पर रोमांचक अनुभव हो सकता है।

लेकिन एक्शन की अधिकता कई जगह कहानी पर भारी पड़ती है। कुछ सीक्वेंस ऐसे लगते हैं जिन्हें केवल फिल्म का स्केल बढ़ाने के लिए जोड़ा गया है। यदि इन्हें थोड़ा कम किया जाता तो कहानी ज्यादा तेजी से आगे बढ़ सकती थी।

नयनतारा और कियारा का प्रदर्शन

नयनतारा और कियारा आडवाणी फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आती हैं। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों को बेहतर तरीके से निभाने की कोशिश की है। नयनतारा अपने अनुभव के कारण कई दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं, जबकि कियारा आडवाणी का किरदार कहानी में ग्लैमर के साथ कुछ महत्वपूर्ण मोड़ भी लेकर आता है।

हुमा कुरैशी भी फिल्म में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। हालांकि सहायक कलाकारों के कई किरदारों को स्क्रीन पर पर्याप्त विस्तार नहीं मिल पाता। कुछ पात्रों की पृष्ठभूमि और उनके फैसलों को और बेहतर तरीके से समझाया जा सकता था।

यश की ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल और एक्शन का ओवरडोज, कहानी ने किया निराश

स्क्रीनप्ले और कहानी सबसे कमजोर पक्ष

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका स्क्रीनप्ले है। कहानी में कई घटनाएं एक साथ चलती हैं और दर्शक को उन्हें समझने के लिए लगातार ध्यान देना पड़ता है। कुछ जगह घटनाओं के बीच संबंध स्पष्ट नहीं हो पाता।

फिल्म की लंबाई भी परेशानी बढ़ाती है। करीब तीन घंटे की अवधि में कई दृश्य ऐसे हैं, जिनका कहानी पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। इन हिस्सों को हटाकर फिल्म को ज्यादा चुस्त बनाया जा सकता था।

फिल्म में स्टाइल और प्रयोग जरूर है, लेकिन हर प्रयोग दर्शक से कनेक्ट नहीं हो पाता। भावनात्मक दृश्यों में भी वह गहराई नहीं आती जिसकी उम्मीद इतनी बड़ी फिल्म से की जाती है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

गीतू मोहनदास ने फिल्म को सामान्य कमर्शियल एक्शन फिल्म से अलग लुक देने की कोशिश की है। सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन पर काफी मेहनत दिखाई देती है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाता है।

फिल्म की तकनीकी गुणवत्ता अच्छी है और बड़े पर्दे पर इसका असर भी दिखाई देता है। लेकिन अच्छे विजुअल्स और बड़े एक्शन के बावजूद कमजोर स्क्रीनप्ले को पूरी तरह छिपाया नहीं जा सका है।

क्या फिल्म देखनी चाहिए?

अगर आप यश के जबरदस्त फैन हैं, बड़े पर्दे पर एक्शन और स्टाइलिश विजुअल्स देखना पसंद करते हैं, तो ‘टॉक्सिक’ आपको पसंद आ सकती है। फिल्म में यश का स्टारडम और एक्शन एंटरटेनमेंट देने के लिए पर्याप्त है।

लेकिन अगर आपकी प्राथमिकता मजबूत कहानी, स्पष्ट स्क्रीनप्ले, भावनात्मक जुड़ाव और संतुलित लंबाई है, तो फिल्म आपको निराश कर सकती है।

अंतिम फैसला

‘टॉक्सिक’ में वह सब कुछ है जो एक बड़े बजट की स्टार फिल्म में होना चाहिए—यश का स्टारडम, स्टाइलिश लुक, बड़े एक्शन सीक्वेंस, शानदार विजुअल्स और दमदार म्यूजिक। लेकिन इन सबके बावजूद कहानी उतनी मजबूत नहीं बन पाती।

फिल्म कई जगह शानदार लगती है, तो कई जगह जरूरत से ज्यादा लंबी और उलझी हुई महसूस होती है। खासकर दूसरे हिस्से में स्क्रीनप्ले को और कसने की जरूरत थी।

फाइनल वर्डिक्ट: स्टाइल और स्टारडम के दम पर चलने वाली ‘टॉक्सिक’ में एक्शन का भरपूर डोज है, लेकिन कहानी का उलझाव और करीब तीन घंटे की लंबाई मजा किरकिरा कर देती है। यश के फैंस के लिए फिल्म एक बार देखने लायक हो सकती है, लेकिन मजबूत कहानी की तलाश में जाने वालों को निराशा हाथ लग सकती है।

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