गोमिया:- सभी पुराने श्रम कानूनों को विलोपित कर वर्ष 2019 एवं 2020 में बनाई गई चार नई श्रम संहिताओं को आगामी 21 नवंबर 2025 से लागू किए जाने को लेकर मजदूर संगठनों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में ठेकेदार मजदूर यूनियन के महासचिव तथा झारखंड आंदोलनकारी इफ्तिखार महमूद ने मजदूरों की सभा को संबोधित करते हुए कहा कि नई श्रम संहिताओं में मजदूरों के हित में कोई भी नई व्यवस्था नहीं की गई है, बल्कि दशकों पुराने अधिकारों को नए नाम से दोहराया गया है।
उन्होंने बताया कि न्यूनतम मजदूरी देना, नियुक्ति पत्र उपलब्ध कराना, महिला-पुरुष को समान वेतन देना, ओवरटाइम के लिए दोगुना भुगतान करना जैसी व्यवस्थाएँ पिछले 50 वर्षों से अलग-अलग अधिनियमों में पहले से ही लागू हैं।
श्री महमूद ने कहा कि —
- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 से,
- नियुक्ति पत्र एवं अन्य श्रमिक सुविधाओं से जुड़े प्रावधान औद्योगिक विवाद अधिनियम 1936 से,
- तथा समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान 1970 के कानून से लागू है।
उन्होंने आरोप लगाया कि नई श्रम संहिताएँ मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय नियोक्ताओं को मनमानी का खुला अधिकार देती हैं। संहिताओं में मालिकों को बिना रोक-टोक मजदूरों की छंटनी करने, उन्हें सेवा से हटाने तथा विवाद की स्थिति में श्रम विभाग के हस्तक्षेप को पूरी तरह रोक दिया गया है।
महामूद ने कहा कि अब किसी भी शिकायत या श्रमिक विवाद में मजदूरों को सीधे श्रम न्यायालय जाना होगा, जिससे मजदूर वर्ग पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा और न्याय पाना कठिन हो जाएगा। उन्होंने इसे मजदूरों को “नियोक्ता का गुलाम” बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया।
सभा में किसान नेता देवानंद प्रजापति, जीतू सिंह, बद्री मुंडा समेत कई लोग उपस्थित थे।