
जमशेदपुर : भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है कि केंद्रीय चुनाव आयोग पर विपक्ष द्वारा आरोप लगाया गया हो. लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि विपक्ष द्वारा मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का आरोप लगाने के आयोग उन आरोप के जवाब देने के बजाए विपक्ष पर ही शपथ देने का दबाव बना रहा है. जबकि यह आयोग की जिम्मेवारी है कि वह मतदाता सूची में छोटी से छोटी से शिकायत का भी निवारण करें ताकि जनता में उसका इकबाल कायम रहे. जहां हाल के दिनों में चुनाव आयोग की कार्यशैली से उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा होता नजर आ रहा है.
वहीं कहीं ना कहीं आयोग निरकुंश होता भी दिख रहा है. यहां सवाल यह है कि आखिर आयोग की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह विपक्ष की शंकाओं का समाधान करने के बजाए अपनी मनमानी पर उतारु है. यहां तक की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सुझाव व निर्देश को भी आयोग ने मानने से इंकार कर दिया. आयोग ने कोर्ट में हलफनामा देकर यह कहा कि बिहार में मतदाता सूची विशेष पुनरीक्षण के दौरान जिन 65,64,000 लोगों के नाम काटे गए हैं.
उनकी अलग से सूची देने के लिए वह बाध्य नहीं है. यहां मजेदार बात यह है कि बिहार सरकार के सांख्यिकी विभाग के अनुसार वर्ष 2022,2023 और 2024 में कुल 12.43 लाख लोगों की मृत्यु हुई है. जबकि आयोग कह रहा है कि जनवरी से जुलाई 2025 के बीच कुल 22 लाख लोगों की मृत्यु हुई है. जिनके नाम मतदाता सूची काट दिए गए. चूंकि आयोग मृत लोगों की अलग से सूची जारी नहीं कर रहा है. ऐसे में संदेह होना जायज है. वहीं मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता योगेद्र यादव ने मतदाता सूची से मृत बताकर नाम काटे गए लोगों को सशरीर उपस्थित कराकर बिहार में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों को सही साबित कर दिया. राजनीतिक दल पहले से ही मतदाता सूची से काटे गए नामों की कारण सहित अलग सूची देने की मांग कर है,
जिसे आयोग देने से इंकार कर रहा है. वहीं आयोग का कहना है कि सभी राजनीतिक दलों के ब्लॉक स्तरीय कार्यकर्ताओं को मतदाता सूची का ड्रॉफ्ट उपलब्ध करा दिया गया है. यह उनकी जिम्मेवारी है कि वह आम लोगों का सहयोग कर उनके नाम मतदाता सूची में जुड़वाने में अपनी भूमिका निभाए. इसके मायने क्या है ? क्या अब तक आयोग अपने सभी कार्य बीएलए के आसरे ही करता रहा है और मतदाता सूची में गड़बड़ियों के लिए बीएलए ही जिम्मेवार है आयोग की कोई जिम्मेवारी व जबाबदेही नहीं, यह अपने आप में बड़ा हास्यपद लगता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतना सब होने के बावजूद प्रारंभ से ही सत्ता पक्ष आयोग को न सिर्फ क्लीन चीट दे रहा बल्कि उसका प्रवक्ता भी बना बैठा है.
शपथ पत्र में उलझा रहा है आयोग
पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई ग़ड़बड़ी का आरोप चुनाव आयोग पर लगाया. आयोग ने उसी दिन राहुल गांधी को नोटिस जारी कर कहा गया कि 20(3)(B) के तहत शपथ पर हस्ताक्षर दे तब हम कार्रवाई करेंगे. जबकि पूर्व चुनाव आयुक्त ओ पी रावत का कहना है कि इस मामले में यह शपथ लागू ही नहीं होता है और इसके तहत जांच भी नहीं हो सकती है. तो फिर आयोग विपक्ष को क्यों शपथ में उलझा कर रखना चाहता है.
बड़ी बात यह कि इतने दिन बीतने के बावजूद आयोग ने ना तो राहुल गांधी के आरोपों का कोई जवाब दिया औक ना ही प्रेस कॉंफ्रेंस कर ही राहलु गांधी के आरोप को झूठा बताया. यदि वास्तव में कहीं कुछ गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. इसकी जवाबदेही भी आयोग की है. लेकिन वर्तमान में आयोग अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन नहीं कर रहा है. इससे कहीं ना कहीं चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का संकट उत्पन्न हो गया जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. अब देश की जनता को निर्णय करना है.