लातेहार: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधन भी बड़ी कामयाबी की राह खोल देते हैं। इस कहावत को सच कर दिखाया है लातेहार जिले के कुलगड़ा गांव निवासी रमेश भुइयां ने। बेहद कम जमीन के मालिक रमेश ने परंपरागत खेती से अलग हटकर स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की और आज वे ग्रामीणों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं। मात्र 5 डिसमिल जमीन में की जा रही स्ट्रॉबेरी की खेती से वे बंपर कमाई कर रहे हैं।
रमेश भुइयां एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। उनके पास खेती योग्य जमीन बहुत कम है, जिससे पारंपरिक फसलें उगाकर पर्याप्त मुनाफा कमा पाना मुश्किल था। परिवार के भरण-पोषण की चिंता के बीच रमेश हमेशा कुछ नया और बेहतर करने की सोचते रहे। इसी बीच कुछ वर्ष पहले गांव में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत जल छाजन समिति का गठन किया गया। रिचूघुटा जल छाजन समिति में रमेश को सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस जिम्मेदारी ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
जल छाजन समिति के सचिव बनने के बाद रमेश की रुचि उन्नत और आधुनिक खेती की ओर बढ़ी। जिला भूमि संरक्षण पदाधिकारी विवेक मिश्रा के मार्गदर्शन और प्रेरणा से उन्होंने गत वर्ष पहली बार अपनी थोड़ी सी जमीन में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। तकनीकी विशेषज्ञ जेके श्रीवास्तव और बुद्धदेव पाल ने भी उन्हें आवश्यक तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण प्रदान किया। नई फसल होने के कारण शुरुआत में थोड़ी आशंका जरूर थी, लेकिन मेहनत और सही मार्गदर्शन का परिणाम सकारात्मक रहा।
पहले ही वर्ष स्ट्रॉबेरी की खेती से रमेश को अच्छी आमदनी हुई। इससे उत्साहित होकर उन्होंने इस वर्ष करीब 5 डिसमिल जमीन में स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए। वर्तमान में वे 25 से 40 हजार रुपये तक की स्ट्रॉबेरी बेच चुके हैं। वहीं खेत में अभी भी लगभग 50 हजार रुपये से अधिक मूल्य के फल लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में ही इतनी आमदनी ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत कर दिया है।
रमेश बताते हैं कि वे अपनी खेती में किसी भी प्रकार के रासायनिक खाद का उपयोग नहीं करते। जैविक तरीके से की गई खेती के कारण लागत कम आती है और फल का स्वाद भी बेहतर होता है। स्थानीय बाजार में उनकी स्ट्रॉबेरी की मांग लगातार बढ़ रही है। लोग सीधे उनके खेत तक पहुंचकर ताजी स्ट्रॉबेरी खरीद रहे हैं।
रमेश की पत्नी मीना देवी भी इस कार्य में उनका पूरा सहयोग करती हैं। वे बताती हैं कि पिछले दो वर्षों से वे दोनों मिलकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं और इससे परिवार की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। बच्चों की पढ़ाई और घरेलू जरूरतों को पूरा करना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है।
रमेश का कहना है कि यदि विभागीय सहयोग और तकनीकी मार्गदर्शन मिलता रहा तो वे अगले वर्ष लगभग 20 डिसमिल जमीन में स्ट्रॉबेरी की खेती करने की योजना बना रहे हैं। उनकी सफलता से गांव के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और नई फसलों की ओर रुचि दिखा रहे हैं।