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बिमरला जंगल में अवैध कटाई का काला कारोबार, ग्रामीणों की सूचना पर उठे सवाल—वन विभाग की चुप्पी पर नाराज़गी

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बिमरला जंगल में अवैध कटाई का काला कारोबार, ग्रामीणों की सूचना पर उठे सवाल—वन विभाग की चुप्पी पर नाराज़गी

रिपोर्टिंग: प्रेम कुमार साहू, घाघरा (गुमला)

घाघरा प्रखंड के बिमरला क्षेत्र स्थित कोडले जंगल में इन दिनों अवैध लकड़ी कटाई का मामला गंभीर रूप ले चुका है। ग्रामीणों के अनुसार, सखुआ सहित कई मूल्यवान पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई पिछले कुछ महीनों में की गई है। क्षेत्र के लोग इसे “संगठित लकड़ी तस्करी” का रूप बता रहे हैं।

सबसे चिंता की बात यह है कि भारी मात्रा में कटाई के बावजूद वन विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे ग्रामीणों में विभाग की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सैकड़ों पेड़ कटे, ग्रामीण बोले—तस्कर खुलेआम आते-जाते हैं

ग्रामीणों का कहना है कि तस्कर बिना रोक-टोक के वाहनों के साथ जंगल में प्रवेश करते हैं और लकड़ी को ले जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि “साधारण लोग अगर थोड़ी सी जलावन लकड़ी भी ले जाएँ, तो विभाग तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन सैकड़ों पेड़ कट जाने की जानकारी न होना आश्चर्यजनक है।”

15 पेड़ों की अनुमति, कटे सैकड़ों—परमिशन का दुरुपयोग?

फॉरेस्टर शेखर सिंह के अनुसार, रैयतों की निजी जमीन पर पेड़ कटाई के लिए विभाग ने एक वर्ष में कुल 15 पेड़ों की ही अनुमति दी थी, जो मई–जून तक काट लिए गए थे।
लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि इस परमिशन के नाम पर सैकड़ों पेड़ों की अवैध कटाई कर दी गई है।

स्थानीय लोगों का तर्क है कि जब फॉरेस्टर विभागीय वाहन के साथ नियमित गश्त करते हैं, तो इतनी बड़ी कटाई की जानकारी न होना समझ के बाहर है।

फॉरेस्टर शेखर सिंह का स्पष्टीकरण

पूछे जाने पर प्रभारी फॉरेस्टर शेखर सिंह ने कहा—
“परमिशन एक वर्ष पहले मिला था। 15 पेड़ मई और बरसात से पहले ही काट दिए गए थे। अब अगर कटाई हुई है तो वह अवैध है, और उस पर कार्रवाई की जाएगी।”

हालाँकि ग्रामीणों का सवाल है—
“कार्रवाई की चेतना केवल शिकायत आने पर ही क्यों जागती है?”

उच्चस्तरीय जांच की मांग

ग्रामीणों ने सरकार एवं उच्च अधिकारियों से मांग की है कि—

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