पाकुड़। विकास की राह देखनी हो तो लोग अक्सर साइन बोर्ड ढूंढते हैं, लेकिन हिरणपुर प्रखंड के रामनाथपुर गांव ने तो कमाल ही कर दिया है। यहां की सड़क देखकर लगता है जैसे इसे किसी ‘गुमनाम दानी’ ने रातों-रात बनवा दिया हो। सड़क एकदम चकाचक है, बालू लोड ट्रैक्टर-ट्रॉली भी सीना तानकर पीसीसी सड़क पर खड़ी नजर आती है, लेकिन मजाल है कि कहीं कोई नाम-पट्टिका या साइन बोर्ड दिख जाए।
मानो यह सड़क खुद ही कह रही हो— “नाम में क्या रखा है?” आमतौर पर 100 मीटर सड़क बनती है और 200 मीटर लंबा बोर्ड लगा दिया जाता है, ताकि दूर से ही पता चल जाए कि किसने बनवाया है। पर रामनाथपुर में कहानी उल्टी है। यहां सड़क तो है, पर उसका ‘क्रेडिट’ किसे जाए—यह जानने के लिए शायद जासूसी करनी पड़े।
यह सड़क किसी फीता काटने, नारियल फोड़ने या भाषणबाजी वाले शोर-शराबे से दूर दिखती है। पूरी तरह ‘सेल्फ-मेड’ अंदाज में अपना काम कर रही है। गांव वालों का भी सीधा जवाब है— “हमें बोर्ड नहीं, मजबूत सड़क चाहिए। बोर्ड पर धूल जमती है, सड़क पर पहिए चलते हैं।”
अक्सर देखने में आता है कि निर्माण से पहले ही नाम की होड़ लग जाती है, लेकिन यहां न पेंट दिखा, न बोर्ड। या तो बोर्ड बनाने वाला रास्ता भूल गया, या फिर सड़क ने ही अपनी पहचान छुपा ली। जो भी हो, यह सड़क दिखावे के दौर में सादगी की मिसाल बन गई है।
अगर आप रामनाथपुर जाएं और बिना बोर्ड वाली इस सड़क से गुजरें, तो समझ जाइए—यह वही ‘मिस्टर इंडिया’ सड़क है, जो बिना प्रचार-प्रसार के अपना फर्ज निभा रही है। इसका सीधा संदेश है— काम ऐसा हो कि बोर्ड की जरूरत ही न पड़े, लोग नाम नहीं, काम याद रखें।
बाकी दुनिया क्या कहती है, इससे इसे फर्क नहीं पड़ता। इसका अपना ही अंदाज है—
“कोई कहे कहता रहे… हम तो ऐसे ही रहेंगे!”