0 0 lang="en-US"> अमर शहीद शेख भिखारी का शहादत दिवस हमें उनके संघर्ष और बलिदान को याद करने का एक अवसर प्रदान करता है:कृषि मंत्री  शिल्पी नेहा तिर्की
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अमर शहीद शेख भिखारी का शहादत दिवस हमें उनके संघर्ष और बलिदान को याद करने का एक अवसर प्रदान करता है:कृषि मंत्री  शिल्पी नेहा तिर्की

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अमर शहीद शेख भिखारी का शहादत दिवस हमें उनके संघर्ष और बलिदान को याद करने का एक अवसर प्रदान करता है:कृषि मंत्री  शिल्पी नेहा तिर्की

अमीन अंसारी की रिपोर्ट,

मांडर:- आज मांडर फोरेस्ट मैदान मे स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद शेख भिखारी व टिकैत उमराव सिंह की 168वां शहादत दिवस मनाया गया। इस कार्यक्रम में कृषि मंत्री झारखण्ड सरकार शिल्पी नेहा तिर्की, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, मो० मोजीबुल्लाह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, फिलीप सहाय एक्का, प्रमुख मांडर अमानत अंसारी, उप प्रमुख मांडर फरीद अंसारी, समीम अख्तर, आरीफ अंसारी, जमील मलीक, अमीत खलखो, मंगा उरांव सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थें।*

 

 आइए 1857 के स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले दोनों वीर योद्धाओं के बारे मे संक्षेप मे जानते हैं:

जैसे कि हम सभी को मालूम है कि आज अमर शहीद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह का शहादत दिवस है। 1857 की क्रांति का बिगुल फूंकनेवाले दोनों वीरों को चुटूपालू घाटी के निकट पेड़ पर बिना मुकदमा चलाए अंग्रेजों ने आठ जनवरी 1858 को फांसी दे दी थी।

 

शेख भिखारी का जन्म 2 अक्टूबर 1819 मे रांची जिला के ओरमांझी प्रखंड के खुदिया लोटवा गांव मे एक साधारण परिवार मे हुआ था। और टिकैत उमराव सिंह का जन्म ओरमांझी प्रखंड के ही खटंगा पातर गांव मे हुआ था यह 12 गांवों का जमींदार था। शहीद शेख भिखारी ठाकुर विश्वनाथ शहदेव के सहयोगी थें। शेख भिखारी की बहादुरी को देखते उन्हें राजा ठाकुर विश्वनाथ के बुलावे पर राजकीय फौज सहित दीवान बनाया गया था।

 चुटूपालू घाटी के पास हुआ था भीषण युद्ध

 

अंग्रेज निराश होकर दानापुर छावनी से काफी बड़ी संख्या में सेना और अस्त्र-शस्त्र लेकर रामगढ़ की तरफ बढ़े। यहां उनसे लोहा लेने के लिए शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह ने रामगढ़ जाकर मोर्चाबंदी आरंभ कर दी। वहां अंग्रेजी सेना के पहुंचते ही जमकर जंग हुई। शेख भिखारी ने अपना अड्डा चुटूपालू घाटी में बनाया था। छह जनवरी 1858 को अंग्रेजी सेना के कमांडर मैकडोनाल्ड ने शेख भिखारी तक पहुंचाने के गुप्त रास्ते का पता लगा लिया। इसके बाद शेख भिखारी और उनके साथ टिकैत उमराव सिंह उनके भाई घासी सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और चुटूपालू घाटी के निकट पेड़ पर बिना मुकदमा चलाए दोनों वीरों को आठ जनवरी 1858 को फांसी दे दी गयी थी।

 

 नोट:– अंग्रेजों ने उन दोनों वीरों को 6 जनवरी 1858 को पकड़ा था और 8 जनवरी 1858 को फांसी दे दी इससे साफ पता चलता है कि अंग्रेजों को इन लोगों से कितना डर और भय था जो बिना मुकदमा चलाए ही दो दिनों के अंदर फांसी के फंदे पे लटका दी।

आज, जब हम शहीद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह के शहादत दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि उनकी शहादत ने हमें यह सिखाया कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए किसी भी बलिदान को तैयार रहना चाहिए। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि यदि हम अपने देश के लिए सच्चे प्यार और समर्पण के साथ कार्य करें, तो हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं।

अमर शहीद शेख भिखारी का शहादत दिवस हमें उनके संघर्ष और बलिदान को याद करने का एक अवसर प्रदान करता है। उन्होंने अपनी जान देकर यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमें अपनी जान की भी परवाह नहीं करनी चाहिए। शेख भिखारी जैसे महान वीरों की बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं। उनके शौर्य और बलिदान को सदा याद रखा जाएगा और यह हमें अपने देश की सेवा में समर्पित रहने के लिए प्रेरित करेगा।*

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