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झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक पर्व,करम पर्व

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झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक पर्व,करम पर्व

आदिवासियों के दिलों में बसता है करम पर्व

बब्लू खान,

लातेहार:- झारखंड एक ऐसा राज्य है जो अपने त्योहारों के लिए जाना जाता है। यह राज्य देश के आध्यात्मिक कैनवास में और रंग भरता है। यहाँ विभिन्न त्योहार पूरे जोश के साथ मनाए जाते हैं। मौज-मस्ती और मौज-मस्ती इसे और भी मज़ेदार बनाती है। झारखंड के त्योहार अनोखे हैं क्योंकि इसमें आदिवासी समुदाय शामिल होते हैं। ऐसा ही एक त्योहार है करम पूजा जिसे राज्य का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। कर्मा पूजा न केवल इस राज्य की जनजातियों द्वारा मनाई जाती है।

यह पर्व मुख्य रूप से भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने के लिए मनाया जाता है, जिसमें करमा और धर्मा की पूजा की जाती है.झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक पर्व है करम पर्व, जो मनाया जाता है कि फसल अच्छी हो. राज्य का पहला सबसे बड़ा पर्व है सरहुल, जो मनाया जाता है जब पेड़ों में फूल और पत्तियाँ आना शुरू होते हैं।

इसके फूल सरहुल में अच्छी बारिश के लिए पूजे जाते हैं और साल या सखुवा के पेड़ों पर अपनी सुंदरता हर जगह बिखेर देते हैं। जब अच्छी बारिश होती है, किसान अपनी फसल लगाते हैं और करमा पर्व को खुशी से मनाया जाता है जब उनका काम पूरा हो जाता है। साथ ही बहने अपने भाइयों को सुरक्षित रखने के लिए प्रार्थना करती हैं झारखंड के लोग कार्मा पर ढोल और मांदर की थाप पर झूमते गाते हैं। करमा पर्व भी आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है। आदिवासी समाज में कर्मा पूजा पर्व एक लोकप्रिय उत्सव है। इस अवसर पर करमा नृत्य भी किया जाता है।

कब मनाया जाता है ? करमा पूजा

यह पर्व सितंबर के आसपास भादो शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे भादों एकादशी भी कहते हैं। जनजातीय समुदाय खेती-बारी के कार्यों की समाप्ति के बाद इसे हर्षोल्लास के साथ मनाता है। इस पर्व के अनेक रूप हैं, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न- भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जैसे-जितिया करम, दसई करम, राजी करम आदि। इस मौके पर पूजा करके आदिवासी अच्छे फसल की कामना करते हैं।

साथ ही बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए प्रार्थना करती है। करमा के अवसर पर पूजा प्रक्रिया पूरा होने के बाद झारखंड के आदिवासी मूलवासी ढोल मांदर और नगाड़ा के थाप पर झूमते है एवं सामूहिक नृत्य करते हैं। यह पर्व सभी लोगों के लिए परंपरा की रक्षा के साथ-साथ मनोरंजन का भी एक अच्छा साधन है जहां पुरुष रात में पेय पदार्थों का सेवन कर पूरी रात नाचते गाते हैं और यह दृश्य देखना भी आंखों को सुकून देती है।

झारखंड के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है।

यह पर्व झारखंड के साथ-साथ अन्य राज्यों से छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश उड़ीसा एवं बंगाल के आदिवासियों द्वारा भी धूमधाम से मनाया जाता है। इनमें राजी करम सभी स्थानों पर एक ही साथ निश्चित तिथि अर्थात् भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि मुख्यतः खुखरा परगना में मनाया जाता है। राँची के पश्चिम में दसई करम तथा कसमार परगना में सोहराई करम के नाम से मनाया जाता है। राज्य के पश्चिम क्षेत्र में करम मनाने के विधि-विधान में थोड़ा-बहुत अंतर पाया जाता है, लेकिन उसका मतलब एक सा ही होता है। करम मुख्यतः सदान, मुंडा, संताल, के बीच करम देवता के रूप में आस्था के प्रतीक हैं।

यह उत्सव है जब बहनें अपने भाइयों को बचाने के लिए उपवास करती हैं

कुंवारी लड़कियां ही इस पर्व को मानती हैं। यह उत्सव है जब बहनें अपने भाइयों को बचाने के लिए उपवास करती हैं, जिसे “करमैती/करमइती” कहा जाता है। इस उत्सव को मनाने के लिए करमैती 3, 5,7 या 9 दिन उपवास करती हैं और पूरी तरह से खाती हैं ।

पहले दिन, करमैती किसी नदी, तालाब या डोभा के किनारे से एक बांस के डालिया में “बालू” या “बाला” उठाती हैं। इसमें (कुलथी, चना, जौ, तिल, मकई, उरद, सुरगुंजा) के बीजों को डालिया में डाल दिया जाता है, जो जावा नामक छोटे छोटे पौधों के रूप में उगते हैं। करमैती जावा को 3, 5, 7 या 9 दिन तक सुबह और शाम में जावा गीत गाकर तथा करम नृत्य कर जगाती हैं।

दशमी के दिन आपको करम राजा को निमंत्रण देना होगा। उस व्यक्ति को जो उपासक है, उसे निमंत्रण दिया जाता है; वह करम वृक्ष के पूरब पक्ष में दो चंगी डाली को माला से बांधकर करम देवता को बताता है कि कल हम लोग ढोल-नगाड़े के साथ आएंगे और आपको हमारे साथ चलना होगा। निमंत्रण देते समय ले जाने वाले डलिया में सिंदूर, बेल पत्ता, सुपारी, संध्या दीया, अरवा चावल की गुंड़ी होती है। एकादशी के दिन सुबह सभी लड़कियां (करमइती) फूल तोड़ने (फुल लहराने) के लिए आसपास के जंगल में चली जाती हैं। बांस से बना हुआ बड़ा टोकरी में फूल, पत्ता, घास, धान आदि डाल देते हैं।

कैसे मनाया जाता है । करम पूजा


झारखंड में होने वाले सभी प्राकृतिक पर्वों का आयोजन “पाहन” द्वारा किया जाता है। पर कई जगहों पर, करम पर्व पर ब्राह्मण भी इसकी पूजा करते हैं। पूजा शुरू होने से पहले आंगन के बीच में पाहन जंगल से करम वृक्ष की शाखा लगाई जाती है। करम शाखा लगाने पर एक अलग गीत भी गाया जाता है।

करमा के वृक्ष से डाल को एक बार में कुल्हाड़ी से काटा जाता है और इसे जमीन पर गिरने नहीं दिया जाता। जंगल से लाकर घर के आंगन या अखरा के बीचों-बीच इसे लगाया जाता है। करमा पूजा के दिन खेत-खलिहान और घर में करमा के छोटे-छोटे डाल लगाए जाते हैं।कर्मा वृक्ष रोपित होने के बाद पूजा के समय गांव के सभी वरिष्ठ नागरिक, बूढ़े-बुजुर्ग, माताएं-बेटियां, भाई-बहन सब पूजा देखने और सुनने के लिए वहाँ आते हैं। पूजा करते समय करम वृक्ष के चारों ओर आसन पर बैठती हैं।

प्रकृति का आराध्य देव मानकर इसे पूजते हैं। और बहने अपने भाइयों को स्वस्थ रखना चाहते हैं। पूजा के दौरान पाहन द्वारा करमा-धरमा की कहानी भी सुनाई जाती है, जो बताती है कि कर्म पर्व मनाना कब से शुरू हुआ था। पूजा पूरी होने पर करमैती अपना भोजन छोड़ देती हैं।तब सभी करमैती और घर के सभी लोग खूब नाच गान करते हैं। नगाड़े की थाप पर मांदर भी थिरक जाता है। करमा नाचते हैं और हरसोल्लास के साथ पूजा करते हैं। पाहन द्वारा पूजा पूरी होने के बाद अगले दिन सुबह करमैती करम वृक्ष के डाल को पूरे गीत गाते और नृत्य करते हुए तालाब, पोखर या नदी में विसर्जित कर देते हैं।

कर्मा पूजा मानाने के पीछे की कहानी – कर्मा पूजा की क्या है इतिहास

कहा जाता है कि करमा-धरमा दो भाई थे। दोनों बहुत मेहनती व दयावान थे कुछ दिनों बाद करमा की शादी हो गई उसकी पत्नी अधर्मी और दूसरों को परेशान करने वाली विचार की थी। यहां तक कि धरती मां के पीड़ा से बहुत दुखी था। और इससे नाराज होकर वह घर से चला गया उसके जाते ही सभी के कर्म किस्मत भाग्य भी चला गया और वहां के लोग दुखी हो गए और धरमा से लोगों की परेशानी नहीं देखी गई और वह अपने भाई को खोजने निकल पड़ा।

कुछ दूर चलने पर उसे प्यास लग गई आसपास कहीं पानी नहीं था। दूर एक नदी दिखाई दिया वहां जाने पर देखा कि उसमें पानी नहीं है। नदी ने धर्मा से कहा जबसे आपके भाई यहां से गए हैं तब से हमारा कर्म फूट गया है, यहां तक की पेड़ के सारे फल ऐसे ही बर्बाद हो जाते हैं अगर वे मिले तो उनसे कह दीजिएगा और उनसे उपाय पूछ कर बताइएगा। धर्मा वहां से आगे बढ़ गया आगे उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला उन्होंने बताया कि जब से करमा यहां से गया है, उनके सर के बोझ तब तक नहीं उतरते हैं जब तक तीन चार लोग मिलकर ना उतारे।

ये बात करमा से कहकर निवारण के उपाय बताना, धर्मा वहां से भी बढ़ गया। आगे उसे एक महिला मिली उसने बताई कि जब से वे गए हैं खाना बनाने के बाद बर्तन हाथ से चिपक जाते हैं, इसके लिए क्या उपाय हैं, आप करमा से पूछ कर बताना। धरमा आगे चल पड़ा, चलते चलते एक रेगिस्तान में जा पहुंचा, वहां उसने देखा कि करमा धूप गर्मी से परेशान हैं उसके शरीर पर फोड़े फुंसी पड़े हैं, और वह व्याकुल हो रहा है। धरमा से उसकी हालत देखी ना जा रही थी।

उसने करमा से आग्रह किया कि हुआ घर वापस चले तो करम ने कहा कि मैं उस घर कैसे जाऊं जहां पर मेरी पत्नी जमीन पर माड़ फेंक देती है तब धर्मा ने वचन दिया कि आज के बाद कोई भी महिला जमीन पर माड़ नहीं फेकेगीं, फिर दोनों भाई वापस चले तो उस सबसे पहले वो महिला मिली तो उससे करमा ने कहा कि तुमने किसी भूखे को खाना नहीं खिलाया था इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हुआ, आगे अंत में नदी मिला तो करमा ने कहा तुमने किसी प्यासे को साफ पानी नहीं दिया, आगे किसी को गंदा पानी मत पिलाना आगे कभी ऐसा मत करना, तुम्हारे पास कोई आए तो साफ पानी पिलाना। इसी प्रकार उसने सबको उसका कर्म बताते हुए घर आया और पोखर में करम का डाल लगाकर पूजा किया। इसके बाद पूरे इलाके में लोग फिर से खुशी से जीने लगे और फिर से खुशहाली लौट आई उसी को याद कर आज करमा पर्व मनाया जाता है।

कुंवारी युवतियां एवं विवाहित महिलाएं बेसब्री से करती है इंतजार

करमा पर्व भाई-बहन के आपसी सद्भाव, स्नेह और प्रेम का प्रतीक है. यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है. इस पर्व का इंतजार कुंवारी युवतियां एवं विवाहित महिलाएं बेसब्री से करती हैं. हजारीबाग जिले के हर प्रखंडों में इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है. बहनें सात दिनों तक करमा गीत के साथ लोक नृत्य करती है. छठा दिन संयत करती हैं. दूसरे दिन निर्जल उपवास किया जाता है. इसी दिन मुख्य पूजा आयोजित होती है. शाम को आंगन में करम पौधे की डाली लगाकर फल, फूल आदि से पूजा की जाती है. इस दौरान महिलाएं करमडाली के चारों ओर घूम-घूमकर गीत गाती हैं.

शादीशुदा महिलाएं अपने मायके में मनाती है पर्व

भाई खीरा लेकर बहनों से सवाल करते हैं कि करमा पर्व किसके लिए करती हो, तो बहनें जबाव देती हैं भाईयों के मंगलकामना के लिए. बाद में भाई खीरे से मारता है, जिसके बाद महिलाएं एवं युवतियां फलाहार करती हैं. अगले दिन सुबह में करम की डाल को पोखर में विसर्जित कर दिया जाता है. इस पर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शादीशुदा महिलाएं अपने मायके में पर्व मनाती हैं.

झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा पर्व है करमा, जिसे आदिवासी और सदान मिल-जुलकर सदियों से मनाते आ रहे हैं। मान्यता के अनुसार करमा पर्व के अवसर पर बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु एवं मंगलमय भविष्य की कामना करती हैं। यह सर्वविदित है कि जनजातियों ने जिन परंपराओं एवं संस्कृति को जन्म दिया, सजाया-सँवारा, उन सबों में नृत्य, गीत और संगीत का परिवेश प्रमुख है। बुद्धेश्वर उरांव जिला परिषद सरयू

कर्मा पर्व, झारखंड राज्य का एक महत्वपूर्ण और प्रमुख पर्व है, जो सदाचार, परंपरा और सामाजिक एकता की महत्वपूर्ण प्रतीक है-धानेसर उरांव पड़हा राजा झारखंड आंदोलनकारी

आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है करमा पर्व : रामचंद्र सिंह मनिका विधायक

लातेहार मनिका के कांग्रेस विधायक और जनजातीय समाज के रीति-रिवाजों को नदजीक से जानने वालें रामचंद्र सिंह बताते हैं कि करमा का त्योहार बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए करती हैं। साथ ही धान रोपनी के बाद इस पर्व को मनाने का कारण है अच्छी फसल के लिए ईश्वर की आराधना।और यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र संबंध और अटूट प्रेम को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि करमा पर्व को आदिवासी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। इस त्योहार में एक खास तरह का नृत्य होता है, जिसे करम नाच कहा जाता है।

करम के वृक्ष की पूजा कर हम बहाने यह कामना करती हैं कि उनके भाई की आयु भी करम के वृक्ष की आयु की तरह अधिक हो और उनके परिवार के सभी सदस्य खुशहाली से अपना जीवन व्यतीत करें। रंजिता एक्का मुखिया चकला चंदवा प्रखंड

करम नृत्य को नई फ़सल आने की खुशी में हम आदिवासी भाई बहन लोग नाच-गाकर मानते है। करम पर्व विभिन्न आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण पर्व है। हरे कृष्णा सिंह पूर्व बीजेपी मनिका विधायक

झारखंड में होने वाले सभी प्राकृतिक पर्वों का आयोजन “पाहन” द्वारा किया जाता है। पर कई जगहों पर, करम पर्व हॉर्स उल्लास के साथ मनाया जाता है । करम मुख्यतः सदान, मुंडा, संताल, के बीच करम देवता के रूप में आस्था के प्रतीक हैं। जातरू मुंडा मल्हन मुखिया चंदवा प्रखंड

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